Chetavni Bhajan

Tu Bhi Pagal Main Bhi Pagal

तू भी पागल मैं भी पागल

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तू भी पागल मैं भी पागल, पागल दुनिया सारी। जान के भी अनजान बने ये, हर को लगी बीमारी ॥ टेक ॥ पता एक दिन जाना जग से, रहे मौत से जग अन्जान। संग में ना इक धेला जावे, फिर भी कहे बनू धनवान। कैसे होंगे बेटा-बेटी, फिर भी माता जनती सन्तान। अन्त समय हो टेम चलन पर, मोह के बस रहता इन्सान। खो देता अपना ईमान, जो मिलता नहीं उधारी ॥1॥ शादी को कहते बर्बादी, फिर भी शादी करते है। नशा उजाड़े सबकी जिन्दगी, दिन रात नशे में रहते है। चिन्ता चिता समान बतावे, चिन्ता करके कई मरते है। अगली पीढ़ी ना देखे पर, जोड़ के धन भरते है। समय बेजाया करते है, जो रहता सदा ही जारी ॥2॥ पाप कभी छुपता ना बताया, छुप के पाप करें सारे। चोरी का धन रूके नहीं पर, हाथ पराये धन मारे। बिन मेहनत के पेट भरे ना, खेल जुये में सब हारे। नजर पराई नार गलत पर, जगह जगह पे मुँह मारे। देते है उपदेश भतेरे, खुद पे ना बात उतारी ॥3॥ सब पागल नहीं तो फिर पागल की क्या निशानी है। राह चलते पत्थर मारे, वो तो पागल अज्ञानी है। बात मेरी अभी खत्म हुई ना, पागल की जुबानी है। अशोक पंछी झूठ लिखे ना, खाक जगत की छानी है। जो लिखता कड़वी कहानी है, जो लगती हर को खारी ॥4॥

✍️ रचयिता: अशोक पंछी

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