Man Tu Tyag Jagat Ka Latka
मन तूं त्याग जगत का लटका
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मन तूं त्याग जगत का लटका।
गुरू के वचन को मान मेरा भंवरा, हट जाय जम का खटका ॥ टेक ॥
ममता त्याग धार दृढ़ समता, परदा हटाय दे घट का।
बिरही वेष बनाय तुरत ही, रूप त्याग दे नट का ॥1॥
तज अभिमान भजन कर हरि का, मिट जाय भव का भटका।
मन को मार सुधार बचन को, इन्द्रिन का तज चटका ॥2॥
जब तक श्वास रहे काया में, पिव प्रेमी का लटका।
मान बड़ाई त्याग करो नित, बास त्रिवेणी तट का ॥3॥
निश्चय होय बासना छूटै, भेद मिटै घट पट का।
अमृत अपना रूप लखे तब, अमृत जैसा गटका ॥4॥
✍️ रचयिता: अमृत
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