Chetavni Bhajan

Jo Dikhta Wo Hota Nahi

जो दिखता वो होता नहीं

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जो दिखता वो होता नहीं, जो होता नजर आता कोन्या। पड़ा रहे नजरों पे पर्दा, ध्यान उधर जाता कोन्या ॥ दोहा ॥ दिखता था कंगाल उसके घर में खजाना पड़ा मिला, सूट-बूट में दिखता था, लिये कर्ज का बोझ खड़ा मिला। जिस खण्डर में भूत नाचते, वो हीरे मोती जड़ा मिला, बाहर से दिखता था सुन्दर, अन्दर दिल का सड़ा मिला। दुख में साथ जो खड़ा मिला, वो कभी किसे कहता कोन्या ॥1॥ लड़ बैठे कमजोर समझ, मैदान उसी ने मार लिया, जो दिखता था मोटा तगड़ा, डर डर के रण हार लिया। दिखता था जो खोटा बेटा, टोटे में घर को सार लिया, जिसपे था भरोसा ज्यादा, घात लगा गला तार लिया। साथ हमारा उसने दिया, जिनसे अपना नाता कोन्या ॥2॥ यार बन के साथ रहा, उस यार ने नीचे गिराया कभी, दुश्मन समझ रहे जिसको, उसने ही साथ निभाया कभी। कम बोले शरमावे घणी, उस नार पति मरवाया कभी, ज्यादा हँसना कड़वा बोल, उसने ही घर बसाया कभी। सीमा पे प्राण गंवाया कभी, इतिहास नाम पाता कोन्या ॥3॥ कानों सुनी और आँखों देखी, भी झूठी हो जाती है, बाहर खोजते फिरे गलिया, कमियां खुद में मिल जाती है। मीठी बातें किया भरोसा, नजरे धोखा खा जाती है, सुन्दर महल दिख जाये सभी, पर नींव नजर ना आती है। इक कलम मेरी तो साथी है, यो पंछी अशोक गाता कोन्या ॥4॥

✍️ रचयिता: अशोक

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