Chetavni Bhajan

Ghar Baithe Bhojan Na Mile

घर बैठे भोजन ना मिले

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घर बैठे मिलता ना भोजन, फिरता वो ही चरता है। बैठा जो तकदीर भरोसे, इक दिन भूखा मरता है॥ कुआँ नहीं चल के आता, प्यासे को जाना पड़ता है। ज़मींदार को पेट भरने को, अनाज उगाना पड़ता है। घर बैठे ना जीत मिले, जा रण में लड़ना पड़ता है। अच्छा गायक बनने को, दंगल में गाना पड़ता है। जैसे करम करेगा आदमी, वैसा ही फल भरता है॥1॥ रुपये-पसीने का पैसा, मेहनत से कमाना पड़ता है। गिरे ना कभी मकान, नींव मजबूत बनाना पड़ता है। आलसी को जमा पैसा, इक रोज़ गँवाना पड़ता है। गलत रास्ते चल आखिर, हर को पछताना पड़ता है। पीछे वो रह जाए, आगे चलने से जो डरता है॥2॥ घर छुड़वाए पापी पेट, परदेश में जाना पड़ता है। गरीबी-बेकारी, दर-दर ठोकर हर को खाना पड़ता है। मेहनत और लगन से, ज़माने को झुकाना पड़ता है। भीड़ में भी चल के, रास्ता खुद को बनाना पड़ता है। कर्महीन माणस धरती, बेमतलब बोझा धरता है॥3॥ खोटी नीयत घर बैठा, बिन बात के जो लड़ता है। रोग-दोष आए कंगाली, हर दिन हर पल झड़ता है। पक्षी दाना-पानी खातिर, आकाश में उड़ता है। अशोक पंछी बिना सार, ना कोई रागनी घड़ता है। भगवान भी हिम्मत वालों का, इक रोज़ खजाना भरता है॥4॥

✍️ रचयिता: अशोक

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