Ganesh Janm Ka Doosra Mat - Punyak Vrat Aur Vishnu Ka Aashirwad

गणेश जन्म का दूसरा मत — पुण्यक व्रत और विष्णु का आशीर्वाद

Ganesh Janm Ka Doosra Mat - Punyak Vrat Aur Vishnu Ka Aashirwad

गणेश जी के जन्म से जुड़ी एक और पावन कथा पुण्यक व्रत की है, जिसका वर्णन विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। बहुत काल तक संतान-सुख से वंचित रहने पर माता पार्वती के मन में एक पुत्र की तीव्र अभिलाषा जागी। जब यह चिंता बढ़ी, तो कैलाश पर सनत्कुमार आदि ऋषि-मुनि और स्वयं भगवान शिव ने विचार किया कि माता को कौन-सा व्रत करना चाहिए जिससे उन्हें सर्वगुण-संपन्न पुत्र की प्राप्ति हो।

तब यह निश्चय हुआ कि माता पार्वती "पुण्यक व्रत" करें — यह भगवान विष्णु की आराधना का एक विशेष व्रत है, जिसका उपदेश स्वयं सनत्कुमार जी ने दिया। माता ने पूर्ण श्रद्धा, नियम और संयम के साथ यह व्रत आरंभ किया। एक वर्ष तक उन्होंने भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक आराधना की, उपवास रखे, दान किए और मन-वचन-कर्म से भगवान श्रीहरि का ध्यान किया।

माता की इस अखंड भक्ति और तपस्या से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रकट होकर वरदान दिया कि माता पार्वती को एक ऐसा दिव्य पुत्र प्राप्त होगा जो समस्त लोकों में पूजनीय, बुद्धि और विवेक का अधिष्ठाता तथा विघ्नों का नाशक होगा। स्वयं श्रीहरि ने यह भी कहा कि उस बालक में अलौकिक तेज और मंगलमय गुण विद्यमान होंगे, और वह देवताओं में भी अग्रपूज्य कहलाएगा।

व्रत के फलस्वरूप माता पार्वती को एक अत्यंत तेजस्वी और सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र-जन्म के इस मंगल अवसर पर समस्त देवता, गंधर्व, ऋषि-मुनि और लोकपाल कैलाश पर एकत्र हुए और बालक को आशीर्वाद देने लगे। स्वयं भगवान विष्णु ने आकर बालक को अपना दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया और उसकी अग्रपूज्यता की घोषणा की। इस प्रकार यह बालक ईश्वरीय कृपा और मातृ-भक्ति दोनों के संयोग से प्रकट हुआ।

इस मत के अनुसार गणेश जी का जन्म केवल किसी घटना का परिणाम नहीं, अपितु दीर्घ तपस्या, व्रत और श्रीहरि की अनुकंपा का सुफल है। यही कारण है कि गणेश जी को न केवल शिव-पार्वती का पुत्र, अपितु समस्त देवशक्तियों के आशीर्वाद से संपन्न आराध्य माना जाता है, जिनकी पूजा से भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

इस कथा का भाव यही है कि श्रद्धा और संयम से किया गया व्रत कभी निष्फल नहीं जाता; भगवान की भक्ति से जो फल प्राप्त होता है, वह लौकिक-अलौकिक दोनों दृष्टि से मंगलकारी होता है — और गणपति उसी मंगल के मूर्त रूप हैं।

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