
शिव-गणेश युद्ध और बालक का मस्तक कटना
Shiv-Ganesh Yuddh Aur Balak Ka Mastak Katna
माता पार्वती की आज्ञा पाकर वह तेजस्वी बालक कैलाश-भवन के द्वार पर अडिग पर्वत-सा खड़ा हो गया। उसके हृदय में केवल एक ही भाव था — माता की आज्ञा का पालन। इसी बीच भगवान शिव अपने गणों के साथ भ्रमण से लौटे और अपने ही भवन में प्रवेश करने चले, किंतु द्वार पर खड़े बालक ने विनम्र किंतु दृढ़ स्वर में उन्हें रोक दिया — "ठहरिए! भीतर माता स्नान कर रही हैं। उनकी आज्ञा के बिना कोई भीतर नहीं जा सकता।"
भगवान शिव को इस अपरिचित बालक का यह कहना विचित्र लगा। वे बोले — "बालक, तू जानता नहीं कि यह मेरा ही धाम है और भीतर विराजमान देवी मेरी अर्धांगिनी हैं।" किंतु बालक अपनी आज्ञा पर अटल रहा और किसी भी प्रकार मार्ग नहीं दिया। तब शिवगणों ने बालक को समझाया, फिर धमकाया, पर वह टस से मस न हुआ। गणों और बालक के बीच संघर्ष छिड़ गया, किंतु उस बालक के अपार बल के आगे समस्त शिवगण पराजित होकर पीछे हट गए।
यह देखकर भगवान शिव ने विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं को बुलाया। सभी ने बालक को समझाने का यत्न किया, पर वह अपनी माता की आज्ञा से एक पग भी पीछे न हटा। उसका यह बल और यह निष्ठा देखकर सब आश्चर्यचकित रह गए। यह कोई साधारण बालक नहीं था — यह स्वयं शक्ति का अंश था, इसीलिए देवगण भी उसे परास्त न कर सके।
अंततः यह जानकर कि यह विघ्न बिना बल-प्रयोग के नहीं मिटेगा, और बालक की उत्पत्ति के रहस्य से अनभिज्ञ रहते हुए, भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उस बालक पर प्रहार किया। दिव्य लीला के अंतर्गत बालक का मस्तक धड़ से अलग हो गया। यह घटना क्रोध या विनाश का नहीं, अपितु उस महान लीला का आरंभ थी जिसके द्वारा उस बालक को समस्त लोकों में अमरता और अग्रपूज्यता प्राप्त होनी थी।
जब माता पार्वती स्नान के पश्चात बाहर आईं और अपने प्रिय पुत्र को इस अवस्था में देखा, तो उनका हृदय शोक और क्रोध से काँप उठा। उन्होंने प्रलयंकारी रूप धारण कर लिया और सारी सृष्टि थर्रा उठी। तब समस्त देवता और स्वयं शिव को यह अनुभव हुआ कि यह बालक कोई साधारण नहीं, अपितु देवी का ही अंश है, और अब इस स्थिति का समाधान आवश्यक है।
इस कथा का भाव यही है कि सच्ची आज्ञाकारिता और कर्तव्यनिष्ठा अद्वितीय होती है; गणेश जी की यह अटल निष्ठा हमें सिखाती है कि अपने धर्म और कर्तव्य पर दृढ़ रहना ही सच्ची भक्ति है।