Shani Ki Drishti Ki Katha - Mastak Ka Bhasm Hona

शनि की दृष्टि की कथा — मस्तक का भस्म होना

Shani Ki Drishti Ki Katha - Mastak Ka Bhasm Hona

गणेश जन्म की एक अन्य प्रचलित कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलती है, जो शनिदेव की दृष्टि से जुड़ी है। जब माता पार्वती को एक सुंदर, तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई, तो कैलाश पर आनंद की लहर दौड़ गई। पुत्र-जन्म की मंगल-बेला में समस्त देवता, ऋषि-मुनि और गण बालक के दर्शन और आशीर्वाद हेतु उमड़ पड़े। माता का हृदय हर्ष और वात्सल्य से भर उठा था और वे चाहती थीं कि सभी देवता उनके पुत्र को देखकर आशीर्वाद दें।

इसी अवसर पर न्याय और कर्मफल के देवता शनिदेव भी दर्शन के लिए पधारे। किंतु शनिदेव ने अपना मस्तक नीचा किए रखा और बालक की ओर दृष्टि नहीं उठाई। इसका कारण यह था कि शनिदेव पर एक शाप था कि जिस पर भी उनकी पूर्ण दृष्टि पड़ेगी, उसका अनिष्ट हो जाएगा। अपनी इसी दृष्टि के दोष को जानते हुए वे बालक की ओर देखने से संकोच कर रहे थे।

माता पार्वती ने जब देखा कि शनिदेव उनके पुत्र की ओर नहीं देख रहे, तो उन्हें दुःख हुआ। उन्होंने आग्रह किया — "हे शनिदेव! सभी देवता मेरे पुत्र को देखकर आशीर्वाद दे रहे हैं, फिर आप क्यों दृष्टि नहीं डालते?" शनिदेव ने अपनी दृष्टि के दोष के विषय में माता को सावधान किया, किंतु माता ने अपने पुत्र के तेज और शिव-शक्ति के अंश पर पूर्ण विश्वास रखते हुए बार-बार आग्रह किया।

माता के अत्यधिक आग्रह पर शनिदेव ने विवश होकर एक क्षण के लिए बालक की ओर तिरछी दृष्टि से देखा। दिव्य विधान के अनुसार, उस दृष्टि के पड़ते ही बालक का मस्तक धड़ से अलग होकर भस्म हो गया। यह घटना किसी अनिष्ट की नहीं, अपितु उस महान लीला का ही अंग थी जिसके द्वारा गणेश जी को उनका अलौकिक गजमुख स्वरूप और अमर महिमा प्राप्त होनी थी। माता का करुण क्रंदन गूँज उठा।

तब भगवान विष्णु अपने गरुड़ पर सवार होकर तत्काल वहाँ पधारे। वे उत्तर दिशा की ओर गए और वहाँ एक गजराज का मस्तक लाकर बालक के धड़ पर स्थापित किया तथा अपनी शक्ति से उसमें प्राणों का संचार किया। बालक पुनः जीवित हो उठा, अब गजमुख धारण किए हुए। सभी देवताओं ने उसे आशीर्वाद दिया और शनिदेव को भी माता ने क्षमा कर दिया, यह समझते हुए कि यह सब ईश्वरीय विधान था।

इस कथा का भाव यही है कि कर्मफल का विधान अटल है और ईश्वर की लीला अपार; जो घटना दुःखद प्रतीत होती है, वही कभी-कभी दिव्य कल्याण का द्वार बन जाती है — गजानन का यही मंगल स्वरूप इसका साक्षी है।

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