
गणेश जन्म — पार्वती द्वारा उबटन से बालक का सृजन
Ganesh Janm - Parvati Dwara Ubtan Se Balak Ka Srijan
कैलाश पर्वत पर, जहाँ हिमशिखरों की श्वेत आभा सदा भगवान शिव के तप की शीतलता ओढ़े रहती है, माता पार्वती अपने भवन में निवास करती थीं। भगवान शंकर प्रायः समाधि में लीन रहते या गणों के साथ भ्रमण पर निकल जाते, और शिवगण नंदी, भृंगी आदि सब शिव की ही आज्ञा मानते थे। ऐसे में माता को कभी-कभी यह अनुभव होता कि उनके अपने कहलाने वाला, केवल उनकी आज्ञा में रहने वाला कोई अपना सेवक, कोई अपना पुत्र होना चाहिए।
एक दिन जब माता स्नान के लिए तैयार हो रही थीं, तो उन्होंने अपनी सखियों जया और विजया से कहा कि जब मैं भीतर स्नान करूँ, तब द्वार पर पहरा देना और बिना मेरी अनुमति के किसी को भीतर न आने देना। किंतु उसी समय भगवान शिव आ पहुँचे और सखियाँ उन्हें रोक न सकीं। इस घटना से माता के मन में विचार उठा कि अब कोई ऐसा द्वारपाल चाहिए जो केवल मेरा हो और मेरी आज्ञा का ही पालन करे।
तब माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगे उबटन (हल्दी-चंदन आदि से बने मंगल-द्रव्य) को उतारा और उससे एक सुंदर, तेजस्वी बालक की आकृति गढ़ी। उस पुतले में उन्होंने अपनी ममता, अपनी शक्ति और अपने प्राण-तेज का संचार किया। देखते ही देखते वह मिट्टी-सा पुतला जीवित हो उठा — एक अत्यंत रूपवान, बलशाली और विनम्र बालक, जिसके नेत्रों में माता के प्रति अपार श्रद्धा झलकती थी। माता का हृदय वात्सल्य से भर उठा और उन्होंने उसे अपना पुत्र मानकर हृदय से लगा लिया।
माता ने बालक को समझाया — "पुत्र! तुम मेरे अपने हो, मेरे ही अंश से उत्पन्न। तुम्हारा एक ही कर्तव्य है — मेरी आज्ञा का पालन। अब मैं स्नान करने जा रही हूँ; तुम द्वार पर खड़े होकर पहरा दो और मेरी अनुमति के बिना किसी को भीतर न आने देना, चाहे वह कोई भी क्यों न हो।" बालक ने माता के चरणों में मस्तक झुकाकर यह आज्ञा शिरोधार्य की और एक दंड हाथ में लेकर द्वार पर दृढ़ता से खड़ा हो गया।
इस प्रकार माता पार्वती की इच्छाशक्ति और तपोबल से उस अद्भुत बालक का जन्म हुआ, जो आगे चलकर समस्त विश्व का आराध्य, विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य श्रीगणेश कहलाया। उनका जन्म किसी सामान्य प्रक्रिया से नहीं, अपितु शुद्ध चेतना और मातृ-वात्सल्य से हुआ, यही उनके अलौकिक स्वरूप का मूल है।
इस कथा का भाव यही है कि जहाँ शुद्ध भाव और भक्ति होती है, वहाँ स्वयं ईश्वर प्रकट हो जाते हैं; माता की ममता से जन्मे गणपति सदा अपने भक्तों की रक्षा में तत्पर रहते हैं।