
विकट अवतार — कामासुर वध
Vikata Avatar — Kamasur Vadh
पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि एक बार भगवान विष्णु के किसी क्षण में उत्पन्न भाव से एक शक्ति प्रकट हुई जो अनियंत्रित इच्छा और विषय-वासना का प्रतीक थी। यही शक्ति मूर्त होकर कामासुर बनी — काम अर्थात वह अदम्य लालसा जो मन को इन्द्रिय-सुखों की ओर बलपूर्वक खींचती है। कामासुर ने शिव की तपस्या कर अजेय होने का वरदान पाया और उसका मद बढ़ता ही गया।
वरदान पाकर कामासुर ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसके प्रभाव से देवता, ऋषि और मनुष्य सभी विषय-भोगों के पीछे भागने लगे; संयम और साधना नष्ट होने लगी। जहाँ काम अनियंत्रित होता है, वहाँ विवेक क्षीण हो जाता है और मनुष्य अपने उच्च लक्ष्य को भूलकर क्षणिक सुखों में उलझ जाता है। सारी सृष्टि इस अशान्ति से व्याकुल हो उठी।
व्यथित देवता और ऋषि मुद्गल ऋषि की शरण में गए। मुद्गल ने बताया कि काम अत्यन्त प्रबल शत्रु है, और इसे केवल वही जीत सकते हैं जो पूर्ण संयम और आत्मनियंत्रण के स्वरूप हैं। उन्होंने गणेश के विकट स्वरूप की आराधना का उपदेश दिया — विकट अर्थात वह विराट और दुर्जेय स्वरूप जिसके सामने वासना का बल टिक नहीं सकता। सबने मयूर पर विराजमान विकट गणेश की उपासना आरम्भ की।
तब मयूर पर सवार, विशाल और तेजस्वी विकट गणेश प्रकट हुए। उनका दिव्य स्वरूप मानो यह घोषणा कर रहा था कि जो अपनी इन्द्रियों का स्वामी है, उसे कोई वासना पराजित नहीं कर सकती। उनके संयममय तेज से देवताओं के भीतर आत्मबल जाग उठा।
विकट और कामासुर के बीच घोर संग्राम हुआ। भगवान के संयम और आत्म-तेज के सामने कामासुर का सारा उन्माद शान्त होने लगा। अंत में असुर हार मानकर चरणों में गिर पड़ा और बोला — "प्रभु, आपके संयम के सामने मेरी वासना का कोई बल नहीं।" विकट ने उसे क्षमा कर आज्ञा दी कि वह अब उन हृदयों को न घेरे जहाँ संयम, साधना और भगवान का स्मरण हो।
तभी से माना जाता है कि विकट का भक्त काम रूपी इस प्रबल शत्रु पर विजय पा लेता है। वह अपनी इन्द्रियों का दास नहीं, स्वामी बनता है, और संयमित जीवन जीकर अपने वास्तविक लक्ष्य की ओर बढ़ता है।
भाव: यह कथा हमें अनियंत्रित काम-वासना को संयम और आत्मनियंत्रण से जीतना सिखाती है।