
वक्रतुंड अवतार — मत्सरासुर वध
Vakratunda Avatar — Matsarasur Vadh
कहते हैं कि सृष्टि के आरम्भिक युगों में जब देवता और ऋषि तप और साधना में लीन रहते थे, तब इन्द्रलोक में एक विचित्र घटना घटी। देवराज इन्द्र किसी क्षण अपने कर्तव्य से विमुख हुए और उनके भीतर से एक अंधकारमय भाव प्रकट हुआ — दूसरों की समृद्धि, दूसरों के सुख, दूसरों की सिद्धि को देखकर मन में जलन उठने लगी। यही जलन घनीभूत होकर एक भयंकर असुर के रूप में मूर्तिमान हो गई, जिसका नाम पड़ा मत्सरासुर — अर्थात ईर्ष्या का अवतार। जो प्राणी दूसरे को सुखी देख नहीं सकता, वही मत्सर कहलाता है, और वही असुर बनकर तीनों लोकों पर छा गया।
मत्सरासुर ने महादेव शिव की कठोर आराधना की और अजेय होने का वरदान पा लिया। वरदान पाते ही उसका अहित-भाव और प्रबल हो गया। उसने अपने पुत्रों सुन्दरप्रिय और विषय को सेनापति बनाकर स्वर्ग पर आक्रमण किया। देवता पराजित होकर भागे, ऋषियों के यज्ञ भंग हुए, और सारी सृष्टि में एक-दूसरे के प्रति द्वेष और स्पर्धा की आग फैलने लगी। जहाँ मत्सर होता है, वहाँ न प्रेम टिकता है, न शान्ति; इसलिए तीनों लोक व्याकुल हो उठे।
व्यथित देवता और ऋषि दत्तात्रेय के पास पहुँचे। दत्तात्रेय ने उन्हें उपाय बताया — "जो विघ्नों के नाशक हैं, जो हर वक्र (टेढ़े) भाव को सीधा कर देते हैं, उन गणेश के वक्रतुंड स्वरूप की आराधना करो। ईर्ष्या रूपी इस असुर को केवल वही जीत सकते हैं जो मन के टेढ़ेपन को दूर करते हैं।" सबने मिलकर एकाक्षर मंत्र से वक्रतुंड की उपासना की।
तब सिंह पर विराजमान, विशाल गजमुख वाले, वक्र सूँड से शोभित भगवान गणेश वक्रतुंड रूप में प्रकट हुए। उनकी सूँड की वक्रता मानो यह घोषणा कर रही थी कि वे हर टेढ़े, कुटिल और द्वेषपूर्ण भाव को मोड़कर सन्मार्ग पर ले आते हैं। उनके तेज से दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं और असुरों के हृदय काँप उठे।
घोर संग्राम हुआ। वक्रतुंड ने अपनी सूँड से मत्सरासुर की समस्त सेना को तितर-बितर कर दिया। जब असुर ने देखा कि उसका बल क्षीण हो रहा है, तो उसने चरणों में गिरकर शरण माँगी। करुणानिधि गणेश ने उसे क्षमा किया, पर एक शर्त पर — कि वह अब कहीं भी उस हृदय में प्रवेश न करे जहाँ भगवान का स्मरण होता हो। जहाँ भक्ति है, वहाँ ईर्ष्या नहीं ठहर सकती; यही वक्रतुंड की विजय का रहस्य था।
तभी से यह मान्यता है कि जो मनुष्य वक्रतुंड का स्मरण करता है, उसके मन से मत्सर का अंधकार मिट जाता है। दूसरों की उन्नति देखकर जलने के बजाय वह प्रसन्न होना सीखता है, क्योंकि भक्त जानता है कि सबका दाता एक ही है।
भाव: यह कथा हमें ईर्ष्या (मत्सर) रूपी भीतरी शत्रु को जीतकर, दूसरों के सुख में सच्चा आनन्द अनुभव करना सिखाती है।