
एकदंत अवतार — मदासुर वध
Ekadanta Avatar — Madasur Vadh
एक बार महर्षि च्यवन के तप के प्रभाव से एक तेजस्वी किन्तु उद्दंड शक्ति ने जन्म लिया। यह शक्ति थी 'मद' — अर्थात अपने बल, रूप, धन और ज्ञान पर घमंड करने का भाव। यही मद घनीभूत होकर एक प्रचंड असुर बन गया, जिसका नाम पड़ा मदासुर। उसने असुरगुरु शुक्राचार्य से 'ह्रीं' बीजमंत्र प्राप्त किया और उसकी साधना कर अपार शक्ति अर्जित की। शक्ति पाते ही उसका घमंड आकाश छूने लगा।
मदासुर ने घोषणा की कि तीनों लोकों में उससे बड़ा कोई नहीं। उसने देवताओं, गंधर्वों और ऋषियों को अपने अधीन कर लिया। जहाँ वह जाता, वहाँ मनुष्यों के भीतर अभिमान भर जाता — लोग अपने-अपने अहं में डूबकर विवेक खो बैठते। सारी सृष्टि मद के नशे में चूर होकर धर्म से विमुख हो चली। यही मद का स्वभाव है — यह बुद्धि को अंधा कर देता है और मनुष्य को उसकी सीमाओं का बोध नहीं रहने देता।
देवता और ऋषि महर्षि सनत्कुमार की शरण में गए। सनत्कुमार ने कहा — "मद को केवल वही जीत सकते हैं जिन्होंने स्वयं अपने अहं का दंत ही तोड़ डाला हो। भगवान गणेश के एकदंत स्वरूप की आराधना करो, जिन्होंने अपना ही एक दाँत त्यागकर संसार को सिखाया कि सच्ची शक्ति त्याग में है, अहंकार में नहीं।" सबने मिलकर एकदंत की उपासना आरम्भ की।
तब मूषक पर विराजमान, एक ही दाँत से सुशोभित, चतुर्भुज एकदंत गणेश प्रकट हुए। उनका टूटा हुआ दाँत मानो यह उपदेश दे रहा था कि पूर्णता अहंकार को छोड़ने में है, उसे ढोने में नहीं। उनके शान्त किन्तु तेजस्वी स्वरूप को देखकर देवताओं का साहस लौट आया।
एकदंत और मदासुर के बीच घोर संग्राम हुआ। जैसे-जैसे गणेश का तेज बढ़ता गया, मदासुर का घमंड चूर होता गया। अंत में मदासुर को अपनी क्षुद्रता का बोध हुआ; वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा और बोला — "प्रभु, आपके सामने मेरा सारा मद व्यर्थ है।" एकदंत ने मुस्कुराकर उसे अभयदान दिया और आज्ञा दी कि वह अब उन हृदयों से दूर रहे जहाँ विनम्रता और भक्ति का वास हो।
तभी से एकदंत का स्मरण करने वाला भक्त अपने बल, बुद्धि और वैभव पर इतराना छोड़ देता है। वह जान जाता है कि जो कुछ उसके पास है, वह भगवान की देन है, और विनम्रता ही सच्चे ऐश्वर्य का आभूषण है।
भाव: यह कथा हमें मद (घमंड) को त्यागकर विनम्रता और त्याग का जीवन जीना सिखाती है।