
गजानन अवतार — लोभासुर वध
Gajanana Avatar — Lobhasur Vadh
एक समय की बात है, जब असुरगुरु शुक्राचार्य के तप से एक शक्ति उत्पन्न हुई जो पाने की, संचय करने की, और कभी तृप्त न होने वाली लालसा का प्रतीक थी। यही शक्ति मूर्त होकर लोभासुर बनी — लोभ अर्थात वह अतृप्त तृष्णा जो जितना पाती है, उतनी ही बढ़ती जाती है। लोभासुर ने भगवान शिव की आराधना कर अजेय होने का वरदान माँगा और पा भी लिया।
वरदान पाते ही लोभासुर ने तीनों लोकों को अपने अधिकार में करने की ठान ली। उसने स्वर्ग, धरती और पाताल के समस्त रत्न, धन और वैभव पर कब्जा कर लिया, फिर भी उसकी भूख शान्त न हुई। उसके प्रभाव से देवता और मनुष्य भी लोभ के वश हो गए — वे संग्रह करते गए पर सन्तोष कभी न पाया। लोभ का यही स्वभाव है — यह हृदय को कभी भरने नहीं देता और मनुष्य को दान, करुणा और त्याग से दूर कर देता है।
देवता व्याकुल होकर भगवान शिव की शरण में गए। शिव ने बताया कि लोभ इतना प्रबल है कि इसे केवल वही जीत सकते हैं जो स्वयं सर्वसमर्थ होकर भी किसी वस्तु के लोभी नहीं, जो सन्तोष के साक्षात स्वरूप हैं। उन्होंने गणेश के गजानन स्वरूप की आराधना का उपदेश दिया। सबने मिलकर उस मंत्र की उपासना की।
तब गजमुख, दिव्य तेज से युक्त, शान्त और सन्तुष्ट स्वरूप वाले गजानन गणेश प्रकट हुए। उनका प्रसन्न और तृप्त मुख मानो यह उपदेश दे रहा था कि सच्ची सम्पदा भीतर के सन्तोष में है, बाहर के संग्रह में नहीं। उनके दर्शन-मात्र से देवताओं के हृदय में सन्तोष का भाव जाग उठा।
जब गजानन लोभासुर के सम्मुख पहुँचे, तो असुर उनके विराट तेज को सहन न कर सका। भगवान की शान्त उपस्थिति के सामने उसकी सारी तृष्णा जलकर राख हो गई। लोभासुर ने चरणों में गिरकर कहा — "प्रभु, आप जिसके पास सब कुछ है फिर भी किसी वस्तु की चाह नहीं, आपके सामने मेरा लोभ लज्जित है।" गजानन ने उसे क्षमा किया और आज्ञा दी कि वह अब उस हृदय में न बसे जहाँ सन्तोष और दानशीलता का वास हो।
तभी से माना जाता है कि गजानन का भक्त लोभ के फंदे से मुक्त हो जाता है। वह जो पाता है उसमें सन्तुष्ट रहता है, और खुले हृदय से दान करता है, क्योंकि वह जान जाता है कि देने में ही सच्ची समृद्धि है।
भाव: यह कथा हमें लोभ को सन्तोष और दानशीलता से जीतना सिखाती है।