
लंबोदर अवतार — क्रोधासुर वध
Lambodara Avatar — Krodhasur Vadh
समुद्र-मंथन के प्रसंग में जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए सागर मथा, तब मोहिनी रूप धारी भगवान विष्णु को देखकर कुछ असुरों के मन में जो आक्रोश और झुँझलाहट उठी, वही घनीभूत होकर एक असुर के रूप में प्रकट हुई। इसका नाम पड़ा क्रोधासुर — क्रोध अर्थात वह अग्नि जो विवेक को भस्म कर देती है। क्रोधासुर ने सूर्यदेव की आराधना कर अपार बल का वरदान पाया।
वरदान पाते ही क्रोधासुर ने तीनों लोकों में उपद्रव मचा दिया। जहाँ वह जाता, वहाँ मनुष्यों और देवताओं के हृदय क्रोध से जल उठते — भाई भाई से लड़ने लगा, मित्र शत्रु बन गए, और शान्ति कहीं टिक न सकी। क्रोध का यही स्वभाव है — यह क्षण भर में वर्षों का स्नेह जला देता है, बुद्धि को नष्ट कर देता है, और मनुष्य से वही करवा देता है जिसका उसे बाद में पछतावा हो।
पीड़ित देवता और ऋषि उपाय ढूँढ़ने लगे और उन्हें बताया गया कि क्रोध की इस अग्नि को केवल वही शीतल कर सकते हैं जो परम धैर्य और क्षमा के स्वरूप हैं। उन्होंने गणेश के लंबोदर स्वरूप की आराधना का निश्चय किया, जिनका विशाल उदर धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक है — जो सब कुछ पचा लेता है, कोई ताप जिसे विचलित नहीं करता।
तब लंबे उदर वाले, शान्त-गंभीर स्वरूप वाले लंबोदर गणेश प्रकट हुए। उनका विशाल उदर मानो यह कह रहा था कि जो व्यक्ति अपने भीतर सब कुछ धारण कर, शान्त रह सकता है, उसे कोई क्रोध पराजित नहीं कर सकता। उनकी शीतल उपस्थिति से वातावरण का ताप कम होने लगा।
लंबोदर क्रोधासुर के सामने खड़े हुए। भगवान के अटल धैर्य और करुणा के आगे असुर का सारा आवेश ठंडा पड़ गया। जैसे जल के सम्मुख अग्नि बुझ जाती है, वैसे ही क्रोधासुर शान्त हो गया। वह चरणों में गिरकर बोला — "प्रभु, आपकी शान्ति के सामने मेरा क्रोध निर्बल है।" लंबोदर ने उसे क्षमा किया और आज्ञा दी कि वह अब उस हृदय में प्रवेश न करे जहाँ धैर्य, क्षमा और भगवान का स्मरण हो।
तभी से माना जाता है कि लंबोदर का भक्त क्रोध पर विजय पा लेता है। कठिन परिस्थितियों में भी वह धैर्य और क्षमा को नहीं छोड़ता, क्योंकि वह जानता है कि शान्ति ही सबसे बड़ा बल है।
भाव: यह कथा हमें क्रोध को धैर्य और क्षमा से जीतना सिखाती है।