
विघ्नराज अवतार — ममतासुर वध
Vighnaraja Avatar — Mamatasur Vadh
पुरातन काल में देवी पार्वती के किसी हास-विनोद के क्षण से एक शक्ति उत्पन्न हुई जो 'मेरा-मेरा' के भाव, अर्थात ममता और आसक्ति का प्रतीक थी। यही शक्ति घनीभूत होकर ममतासुर के रूप में प्रकट हुई — ममता अर्थात वह अत्यधिक मोहपूर्ण लगाव जो मनुष्य को 'यह मेरा है, वह मेरा है' के बंधन में जकड़ लेता है। ममतासुर ने असुरगुरु से मंत्र पाकर कठोर साधना की और अपार बल अर्जित किया।
वरदान पाते ही ममतासुर ने तीनों लोकों को अपने आसक्ति-जाल में बाँध लिया। उसके प्रभाव से देवता और मनुष्य 'मैं और मेरा' के भाव में इतने डूब गए कि परम-तत्व और परोपकार को भूल बैठे। ममता का यही स्वभाव है — यह स्नेह के नाम पर बंधन खड़ा करती है, मनुष्य को संकुचित बना देती है, और उसे यह भूलने नहीं देती कि यह सारा संसार क्षणभंगुर और भगवान का ही है।
पीड़ित देवता और ऋषि उपाय की खोज में लगे। उन्हें बताया गया कि आसक्ति के इस बंधन को केवल वही तोड़ सकते हैं जो समस्त विघ्नों के स्वामी हैं, जो हर बंधन से मुक्त और सबके प्रति समभाव रखते हैं। उन्होंने गणेश के विघ्नराज स्वरूप की आराधना का निश्चय किया — विघ्नराज अर्थात विघ्नों के अधिपति, जो आसक्ति रूपी विघ्न को भी दूर कर देते हैं। सबने शेषनाग पर विराजमान विघ्नराज की उपासना आरम्भ की।
तब शेषनाग पर विराजमान, दिव्य आभा से युक्त विघ्नराज गणेश प्रकट हुए। उनका स्वरूप मानो यह उपदेश दे रहा था कि जो सबका होकर भी किसी से बँधा नहीं, वही सच्चे प्रेम को जानता है। उनके तेज से आसक्ति का अंधकार दूर होने लगा।
विघ्नराज ममतासुर के सम्मुख पहुँचे। भगवान की मुक्त और समभावपूर्ण उपस्थिति के सामने असुर का आसक्ति-बल क्षीण हो गया। ममतासुर को बोध हुआ कि 'मेरा' कुछ भी नहीं, सब कुछ भगवान का है। वह चरणों में गिरकर बोला — "प्रभु, आपके समभाव के सामने मेरी ममता व्यर्थ है।" विघ्नराज ने उसे क्षमा कर आज्ञा दी कि वह अब उस हृदय में न बसे जहाँ समर्पण और भगवान का स्मरण हो।
तभी से माना जाता है कि विघ्नराज का भक्त ममता और आसक्ति के संकुचित बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह स्नेह तो करता है, पर मोह से नहीं बँधता; सब कुछ भगवान को अर्पित मानकर निर्मल प्रेम में जीता है।
भाव: यह कथा हमें ममता-आसक्ति के बंधन को समर्पण और समभाव से जीतना सिखाती है।