
महोदर अवतार — मोहासुर वध
Mahodara Avatar — Mohasur Vadh
सृष्टि के किसी काल में सूर्यदेव की जृम्भा (जँभाई) से एक विचित्र शक्ति उत्पन्न हुई, जो भ्रम और आसक्ति का प्रतीक थी। यह शक्ति घनीभूत होकर मोहासुर के रूप में प्रकट हुई — मोह अर्थात वह भ्रम जो सत्य को असत्य और असत्य को सत्य दिखा देता है। असुरगुरु शुक्राचार्य ने उसे शिक्षा दी और वह शीघ्र ही अत्यन्त बलशाली बन गया।
मोहासुर ने सूर्य को प्रसन्न कर वरदान पाया और तीनों लोकों को अपने भ्रमजाल में बाँध लिया। उसके प्रभाव से देवता अपने कर्तव्य भूल गए, ऋषि अपनी साधना भूल गए, और मनुष्य क्षणिक सुखों के पीछे भागते हुए अपने वास्तविक स्वरूप को ही भूल बैठे। मोह का यही स्वभाव है — यह मनुष्य को सत्य से विमुख कर, नश्वर वस्तुओं में उलझा देता है और मुक्ति के मार्ग को ढँक देता है।
व्याकुल देवता और ऋषि भगवान विष्णु और शिव की शरण में गए, और उन्होंने बताया कि मोह के इस अंधकार को केवल विघ्नहर्ता गणेश ही मिटा सकते हैं। उन्होंने महोदर स्वरूप — जिनका विशाल उदर समस्त ब्रह्मांड को समाहित किए हुए है — की आराधना का उपदेश दिया। महोदर का अर्थ है वह विशाल हृदय जिसमें सम्पूर्ण ज्ञान और सृष्टि समाई हुई है; ऐसे स्वरूप के सामने मोह का भ्रम टिक नहीं सकता।
तब गजमुख, विशाल उदर वाले, ज्ञान और विवेक के अधिपति महोदर गणेश प्रकट हुए। उनका विराट उदर मानो यह घोषणा कर रहा था कि जो सब कुछ अपने भीतर धारण कर सकता है, वही किसी भ्रम में नहीं फँसता। उनके ज्ञानमय तेज से मोह का धुँधलका छँटने लगा।
महोदर मोहासुर के सम्मुख पहुँचे। जैसे ही असुर ने भगवान के ज्ञानपूर्ण नेत्रों में देखा, उसका सारा भ्रम टूट गया; उसे अपने मिथ्यास्वरूप का बोध हो गया। वह हाथ जोड़कर बोला — "प्रभु, आप ही परम सत्य हैं; मेरा मोह आपके विवेक-तेज के सामने अंधकार-मात्र है।" महोदर ने उसे क्षमा किया और आज्ञा दी कि वह अब उन हृदयों में प्रवेश न करे जहाँ भगवान का ज्ञान और स्मरण जीवित हो।
तभी से माना जाता है कि जो भक्त महोदर का स्मरण करता है, उसके मन का भ्रम मिट जाता है। वह नश्वर और अनश्वर का भेद जान जाता है, और आसक्ति के जाल में उलझने के बजाय विवेकपूर्वक जीवन जीता है।
भाव: यह कथा हमें मोह (भ्रम-आसक्ति) को विवेक और ज्ञान से जीतकर सत्य के मार्ग पर चलना सिखाती है।