
विघ्नेश्वर, ओझर — विघ्नासुर का दमन
Vighneshwar, Ozar — Vighnasur Ka Daman
पुणे जनपद के जुन्नर के निकट कुकड़ी नदी के तट पर बसा ओझर ग्राम अष्टविनायक तीर्थों में "विघ्नेश्वर" के धाम के रूप में विख्यात है। यहाँ श्रीगणेश उस विघ्नासुर के दमन करने वाले रूप में विराजते हैं, जिसके कारण उनका नाम ही "विघ्नहर्ता" पड़ा। यह क्षेत्र भक्तों के जीवन से समस्त बाधाओं और विघ्नों को दूर करने वाला माना जाता है।
इस स्थल की कथा राजा अभिनंदन के एक यज्ञ से आरंभ होती है। कहा जाता है कि राजा अभिनंदन ने स्वयं इंद्रपद प्राप्त करने की अभिलाषा से एक महायज्ञ आरंभ किया। इस यज्ञ में उसने देवराज इंद्र को कोई आहुति नहीं दी, जिससे इंद्र क्रोधित हो उठे। अपने पद की रक्षा और यज्ञ को भंग करने के लिए इंद्र ने काल-पुरुष से एक भयंकर असुर को उत्पन्न करने की प्रार्थना की।
इस प्रकार "विघ्नासुर" नामक एक महाभयंकर दैत्य प्रकट हुआ। उसका एकमात्र कार्य था — प्रत्येक शुभ कार्य, यज्ञ और अनुष्ठान में विघ्न डालना। उसने न केवल राजा अभिनंदन का यज्ञ नष्ट किया, बल्कि समस्त पृथ्वी पर आतंक मचा दिया। जहाँ भी कोई ऋषि यज्ञ करता, कोई भक्त पूजा करता, या कोई मंगल कार्य आरंभ होता, विघ्नासुर वहाँ पहुँचकर सब कुछ विध्वंस कर देता। धर्म और यज्ञ-कर्म पूरी तरह ठप हो गए।
त्रस्त ऋषि-मुनि और देवगण अपनी रक्षा की गुहार लेकर विघ्नहर्ता गणेश की शरण में पहुँचे। गणेश ने उनकी पुकार सुनी और विघ्नासुर का दमन करने के लिए प्रस्थान किया। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। गणेश के प्रचंड तेज और अपार बल के आगे विघ्नासुर टिक न सका। पराजित होकर असुर ने अपने प्राण बचाने के लिए गणेश के चरणों में गिरकर क्षमा की याचना की।
दयालु गणपति ने असुर को अभयदान दे दिया, किंतु एक शर्त रखी — विघ्नासुर वहाँ नहीं जाएगा जहाँ गणेश का नाम-स्मरण और पूजन हो रहा हो। असुर ने यह शर्त स्वीकार कर ली और साथ ही प्रार्थना की कि उसका नाम गणेश के नाम के साथ सदा जुड़ा रहे। इस प्रकार गणेश "विघ्नेश्वर" अर्थात विघ्नों के स्वामी कहलाए, और यह वरदान मिला कि जहाँ भी उनकी पूजा होगी, वहाँ कोई विघ्न प्रवेश नहीं कर पाएगा।
देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर गणेश इसी ओझर क्षेत्र में स्थायी रूप से विराजमान हो गए। विघ्नेश्वर की मूर्ति पूर्वाभिमुख है और उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है। मूर्ति के नेत्रों में हीरे और मस्तक पर बहुमूल्य रत्न जड़े हुए हैं। इस मंदिर की सबसे भव्य विशेषता इसका सुनहरा स्वर्णमय शिखर है, जो दूर से ही दमकता है और भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
विघ्नेश्वर गणेश की महिमा अनंत है। यह कथा हमें यह पावन संदेश देती है कि चाहे विघ्न कितने ही प्रबल क्यों न हों, गणेश-स्मरण से वे स्वयं शांत हो जाते हैं। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में विघ्नेश्वर का नाम लेने मात्र से मार्ग की सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। ओझर का यह धाम आज भी लाखों भक्तों के जीवन से विघ्नों का नाश करता है और उन्हें निर्विघ्न सफलता का आशीर्वाद देता है। जय विघ्नेश्वर, गणपति बाप्पा मोरया।