
गिरिजात्मज, लेण्याद्री — पार्वती की तपस्या से जन्म
Girijatmaj, Lenyadri — Parvati Ki Tapasya Se Janm
पुणे जनपद के जुन्नर के निकट कुकड़ी नदी के तट पर स्थित लेण्याद्री की पर्वत-कंदराएँ अष्टविनायक तीर्थों में एक अनूठा स्थान रखती हैं। यहाँ श्रीगणेश "गिरिजात्मज" के रूप में विराजते हैं। "गिरिजा" अर्थात पर्वतराज की पुत्री पार्वती, और "आत्मज" अर्थात पुत्र — इस प्रकार गिरिजात्मज का अर्थ है "पार्वती के पुत्र"। यह एकमात्र अष्टविनायक क्षेत्र है जो किसी गाँव या नदी-तट पर नहीं, बल्कि एक पर्वत की गुफा में स्थित है।
इस पावन स्थल की कथा माता पार्वती की उस अटूट अभिलाषा से जुड़ी है, जिसमें वे गणेश को अपने पुत्र-रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने हृदय में यह संकल्प लिया कि गणपति स्वयं उनके गर्भ से जन्म लें। इस मनोकामना की पूर्ति के लिए उन्होंने इसी लेण्याद्री की गुफा को अपनी तपस्थली बनाया और यहाँ कठोर तप आरंभ किया।
पर्वत की एकांत कंदरा में बैठकर माता पार्वती ने बारह वर्षों तक अखंड तपस्या की। उन्होंने कठिन व्रत और साधना के द्वारा गणेश की आराधना की, यह प्रार्थना करते हुए कि वे उनके पुत्र-रूप में अवतरित हों। उनकी इस अगाध श्रद्धा और तपोबल से प्रसन्न होकर विघ्नहर्ता गणेश ने उनकी मनोकामना स्वीकार की। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के पावन दिन गणेश ने माता पार्वती की गोद में बालक-रूप में जन्म लिया और उन्हें कृतार्थ किया।
इसी कारण यहाँ के गणेश "गिरिजात्मज" कहलाए और यह पर्वत उनकी लीलास्थली बन गया। कहा जाता है कि गणेश ने अपने बाल्यकाल के प्रारंभिक वर्ष इसी लेण्याद्री की गुफाओं में व्यतीत किए, और माता पार्वती ने यहीं उनका लालन-पालन किया। इस प्रकार यह स्थान गणपति के बाल-रूप और मातृ-वात्सल्य का पावन प्रतीक बन गया।
लेण्याद्री का यह मंदिर एक विशाल शिलाखंड को तराशकर बनाया गया है और यहाँ पहुँचने के लिए भक्तों को लगभग तीन सौ से अधिक सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भक्त प्रकृति की सुंदरता और पर्वत की शांति का अनुभव करते हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि यह संपूर्ण मंदिर बिना किसी खंभे या आधार-स्तंभ के, ठोस पत्थर को काटकर निर्मित किया गया है, जो प्राचीन शिल्पकला का अद्भुत नमूना है।
गिरिजात्मज की मूर्ति भी अन्य अष्टविनायक मूर्तियों से भिन्न है — यह उत्तराभिमुख है और गुफा की भीतरी दीवार में उकेरी गई है, जिसके कारण भक्त मूर्ति के पीछे से भी दर्शन कर सकते हैं। मूर्ति की सूंड बाईं ओर है और इसका स्वरूप अत्यंत सौम्य एवं वात्सल्यपूर्ण प्रतीत होता है, मानो अभी भी वे माता की गोद के बालक हों।
गिरिजात्मज गणेश की महिमा अपार है। यह कथा हमें मातृत्व की महानता और तपस्या की शक्ति का संदेश देती है — जब माता पार्वती जैसी देवी को भी गणेश को पुत्र-रूप में पाने के लिए वर्षों तप करना पड़ा, तो यह सिद्ध होता है कि सच्ची श्रद्धा और साधना से असंभव भी संभव हो जाता है। पर्वत की इस पावन गुफा में विराजे गिरिजात्मज के दर्शन से भक्तों के मन में शांति, वात्सल्य और अटूट भक्ति का संचार होता है। जय गिरिजात्मज, गणपति बाप्पा मोरया।