
चिंतामणि, थेऊर — गण राजा और चिंतामणि रत्न
Chintamani, Theur — Gana Raja Aur Chintamani Ratna
पुणे जनपद में मुला-मुठा नदी के संगम के निकट बसा थेऊर ग्राम अष्टविनायक तीर्थों में "चिंतामणि" गणेश के धाम के रूप में विख्यात है। यहाँ के गणपति भक्तों की समस्त चिंताओं का हरण करने वाले हैं, इसीलिए वे "चिंतामणि" कहलाते हैं। जो भी व्यक्ति चिंताओं और मानसिक अशांति से घिरा होता है, वह इस पावन स्थल पर आकर परम शांति का अनुभव करता है।
इस स्थल की कथा एक अद्भुत चिंतामणि रत्न से जुड़ी है। प्राचीन काल में गण नामक एक अहंकारी और उद्दंड राजा था। एक बार वह ऋषि कपिल के आश्रम पहुँचा। ऋषि के पास "चिंतामणि" नामक एक दिव्य रत्न था, जो मनवांछित वस्तुएँ प्रदान करने की शक्ति रखता था। ऋषि ने अपने आतिथ्य से उस रत्न की सहायता से राजा और उसकी सेना के लिए स्वादिष्ट भोजन तथा अनेक बहुमूल्य उपहार प्रस्तुत किए।
उस दिव्य रत्न की अपार शक्ति देखकर राजा गण के मन में लोभ जाग उठा। उसने अनुचित हठ करते हुए ऋषि कपिल से वह रत्न बलपूर्वक छीन लिया और अपने राज्य की ओर चल पड़ा। असहाय ऋषि अपनी अमूल्य निधि खोकर अत्यंत व्यथित हुए और उन्होंने अपनी रक्षा के लिए विघ्नहर्ता गणेश की शरण ली। भगवान गणेश उनकी करुण पुकार सुनकर प्रकट हुए और ऋषि को न्याय दिलाने का वचन दिया।
गणेश की कृपा से ऋषि कपिल ने राजा गण को युद्ध में परास्त कर दिया और चिंतामणि रत्न पुनः प्राप्त कर लिया। किंतु इस घटना से ऋषि को यह अनुभव हुआ कि यह रत्न ही समस्त चिंता और संघर्ष का मूल कारण है। तब उदार-हृदय कपिल ऋषि ने वह चिंतामणि रत्न स्वयं भगवान गणेश के कंठ में समर्पित कर दिया। इसी कारण यहाँ के गणेश "चिंतामणि" के नाम से विख्यात हुए और यह स्थान चिंता-हरण का तीर्थ बन गया।
कहा जाता है कि यह सारी लीला कदंब वृक्ष के नीचे घटित हुई, इसीलिए थेऊर को प्राचीन ग्रंथों में "कदंबनगर" भी कहा गया है। चिंतामणि की मूर्ति स्वयंभू है, पूर्वाभिमुख है और उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है। मूर्ति के नेत्रों में बहुमूल्य रत्न जड़े हुए हैं, जो उनकी दिव्यता को और अधिक तेजस्वी बनाते हैं।
थेऊर का यह क्षेत्र मराठा इतिहास में भी अत्यंत श्रद्धा का केंद्र रहा है। कहते हैं कि पेशवा माधवराव इस धाम के परम भक्त थे और उन्होंने चिंतामणि गणेश की सेवा में अपने जीवन के अंतिम क्षण यहीं व्यतीत किए। उनकी अनन्य भक्ति के कारण इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ गया। मंदिर परिसर में एक विशाल सभामंडप और घंटा है, जो भक्तों को प्राचीन काल की स्मृति कराते हैं।
चिंतामणि गणेश की महिमा है कि जो भक्त अपनी सारी चिंताएँ इनके चरणों में अर्पित कर देता है, उसका मन निश्चिंत और शांत हो जाता है। यह कथा हमें सिखाती है कि सांसारिक वस्तुओं का लोभ ही समस्त चिंता का कारण है, और जब मनुष्य अपना सब कुछ भगवान को समर्पित कर देता है, तब उसे परम शांति प्राप्त होती है। थेऊर का यह पावन धाम आज भी अनगिनत भक्तों की चिंताओं का हरण करता है। जय चिंतामणि, गणपति बाप्पा मोरया।