
सिद्धिविनायक, सिद्धटेक — विष्णु द्वारा मधु-कैटभ वध
Siddhivinayak, Siddhatek — Vishnu Dwara Madhu-Kaitabh Vadh
भीमा नदी के मनोरम तट पर, अहमदनगर जनपद में स्थित सिद्धटेक अष्टविनायक तीर्थों में अत्यंत विशेष स्थान रखता है। यहाँ श्रीगणेश "सिद्धिविनायक" के रूप में विराजते हैं और मान्यता है कि यही एकमात्र अष्टविनायक क्षेत्र है जहाँ गणपति की सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है। दाहिनी सूंड वाले गणेश को अत्यंत जाग्रत और शीघ्र फल देने वाला माना जाता है, इसीलिए यहाँ की उपासना कठोर नियमों से की जाती है।
इस स्थल की कथा सृष्टि के आदिकाल से जुड़ी है। प्रलय के समय जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में शयन कर रहे थे, तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नामक दो महाबलशाली असुर उत्पन्न हुए। ये दोनों दैत्य इतने प्रबल थे कि उन्होंने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा को ही ललकार दिया और समस्त सृष्टि के लिए संकट बन गए। इन दोनों का संहार करना सामान्य कार्य नहीं था।
भगवान विष्णु ने इन असुरों से घोर युद्ध किया, किंतु बहुत प्रयास करने पर भी वे उन्हें परास्त नहीं कर पाए। युद्ध लंबे समय तक चलता रहा और असुर टलने का नाम नहीं ले रहे थे। तब विष्णु को स्मरण हुआ कि किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में विघ्नहर्ता गणेश की पूजा अनिवार्य है, जिसे वे भूल गए थे। बिना गणेश-वंदन के आरंभ किया गया कार्य सिद्ध नहीं होता — यह उन्हें ज्ञात हो गया।
तब भगवान विष्णु इसी टेकरी (पहाड़ी) पर आए और यहाँ बैठकर एकाग्र चित्त से श्रीगणेश की आराधना की। उन्होंने गणपति के "षडक्षर मंत्र" का जप किया और पूर्ण श्रद्धा से उनका आशीर्वाद माँगा। गणेश ने प्रसन्न होकर विष्णु को सिद्धि प्रदान की और विजय का वरदान दिया। इस स्थान पर विष्णु को सिद्धि प्राप्त हुई, इसीलिए यह "सिद्धटेक" कहलाया और यहाँ के गणेश "सिद्धिविनायक" के नाम से प्रसिद्ध हुए।
सिद्धि प्राप्त कर लौटे भगवान विष्णु ने अपार बल के साथ पुनः युद्ध किया और अंततः मधु तथा कैटभ दोनों असुरों का वध कर दिया। सृष्टि पुनः संकटमुक्त हुई और धर्म की पुनर्स्थापना हुई। इस प्रकार सिद्धटेक का यह क्षेत्र स्वयं भगवान विष्णु द्वारा गणेश की उपासना से सिद्ध हुई भूमि के रूप में विख्यात हुआ।
यहाँ की मूर्ति स्वयंभू है और उत्तराभिमुख है। मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को भीमा नदी पार कर टेकरी पर चढ़ना पड़ता है। इस मंदिर की एक विशेष परंपरा है — यहाँ की प्रदक्षिणा अत्यंत लंबी है, जिसे पूरा करने में भक्तों को पहाड़ी के चारों ओर चक्कर लगाना पड़ता है, और यह कठिन प्रदक्षिणा ही भक्ति की परीक्षा मानी जाती है।
सिद्धिविनायक की महिमा है कि जो भक्त सच्चे मन और दृढ़ संकल्प के साथ यहाँ आराधना करता है, उसे उसके अटके हुए कार्यों में सिद्धि अवश्य मिलती है। दाहिनी सूंड वाले इन जाग्रत गणेश की कृपा से मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं। यह क्षेत्र हमें यह शिक्षा देता है कि साक्षात नारायण को भी सफलता के लिए गणेश-वंदन करना पड़ा — तो साधारण मनुष्य को अपने प्रत्येक कार्य के आरंभ में विघ्नहर्ता का स्मरण अवश्य करना चाहिए। जय सिद्धिविनायक, गणपति बाप्पा मोरया।