
वरदविनायक, महड़ — राजा रुक्मांगद और अखंड दीप
Varadvinayak, Mahad — Raja Rukmangad Aur Akhand Deep
रायगढ़ जनपद की सुरम्य घाटियों में बसा महड़ ग्राम अष्टविनायक तीर्थों में "वरदविनायक" के धाम के रूप में प्रसिद्ध है। "वरद" का अर्थ है वर देने वाला — यहाँ के गणेश अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले, वरदान देने वाले देव माने जाते हैं। हरियाली से घिरे इस शांत क्षेत्र में गणपति की उपस्थिति अत्यंत मंगलकारी अनुभव होती है।
इस स्थल की कथा राजा रुक्मांगद से जुड़ी है। प्राचीन काल में रुक्मांगद नामक एक धर्मनिष्ठ और अत्यंत रूपवान राजा था। एक बार वह वन में भ्रमण करते हुए ऋषि वाचक्नवी के आश्रम पहुँचा। ऋषि की पत्नी मुकुंदा राजा के अनुपम सौंदर्य पर मोहित हो गई और उसने राजा से याचना की, किंतु धर्मपरायण रुक्मांगद ने उसका प्रस्ताव विनम्रता से अस्वीकार कर दिया और आगे चला गया।
मुकुंदा की व्यथा को देखकर देवराज इंद्र ने रुक्मांगद का रूप धारण कर लिया और मुकुंदा की इच्छा पूर्ण की। इस संयोग से एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम गृत्समद पड़ा। जब बड़ा होकर गृत्समद को अपने जन्म का यह रहस्य ज्ञात हुआ, तो वह अत्यंत लज्जित और दुखी हुआ। अपने कलंक से मुक्ति पाने और आत्मशुद्धि के लिए उसने कठोर तपस्या का मार्ग चुना।
गृत्समद इसी महड़ के वन में आकर बैठ गया और उसने विघ्नहर्ता गणेश की घोर तपस्या आरंभ की। वर्षों तक उसने अन्न-जल त्यागकर एकाग्र मन से गणपति का ध्यान किया। उसकी अखंड साधना और पश्चाताप से प्रसन्न होकर श्रीगणेश साक्षात प्रकट हुए और उससे वर माँगने को कहा। गृत्समद ने प्रार्थना की — "हे प्रभु! आप इसी स्थान पर सदा निवास करें और यह क्षेत्र भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करने वाला तीर्थ बने।" गणेश ने "तथास्तु" कहा और वहीं "वरदविनायक" के रूप में विराजमान हो गए।
इस मंदिर से जुड़ी अखंड दीप की महिमा अत्यंत विख्यात है। कहा जाता है कि गर्भगृह में एक तेल-दीप है जो अनेक शताब्दियों से निरंतर प्रज्वलित है और आज तक कभी बुझा नहीं। इसे "नंदादीप" कहा जाता है और भक्तगण इसे साक्षात गणेश-कृपा का प्रतीक मानते हैं। इस अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से मन में असीम श्रद्धा और शांति का संचार होता है।
वरदविनायक मंदिर की एक और सुंदर परंपरा यह है कि यहाँ भक्तों को स्वयं गर्भगृह में जाकर मूर्ति के निकट बैठने और अपने हाथों से गणपति की पूजा करने की अनुमति मिलती है, जो अन्य अष्टविनायक मंदिरों में दुर्लभ है। मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है और मंदिर के चारों ओर चार हाथियों की प्रतिमाएँ हैं। कहते हैं कि यह मूर्ति एक तालाब से प्राप्त हुई थी।
वरदविनायक की महिमा यह है कि जो भक्त सच्चे मन से यहाँ वर माँगता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। यह क्षेत्र हमें सिखाता है कि चाहे मनुष्य के जीवन में कितना ही कलंक या दोष क्यों न हो, सच्चे पश्चाताप और अखंड भक्ति से उसका उद्धार निश्चित है। गृत्समद की तपस्या इसका जीवंत प्रमाण है। महड़ का यह पावन धाम आज भी अखंड दीप की तरह भक्तों के हृदय में श्रद्धा की ज्योति जलाए रखता है। जय वरदविनायक, गणपति बाप्पा मोरया।