
बल्लालेश्वर, पाली — बालक भक्त बल्लाल की कथा
Ballaleshwar, Pali — Balak Bhakt Ballal Ki Katha
रायगढ़ जनपद के पाली ग्राम में विराजमान "बल्लालेश्वर" गणेश अष्टविनायक में इस दृष्टि से अनूठे हैं कि यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ गणपति अपने भक्त के नाम से पुकारे जाते हैं। यहाँ के गणेश का नाम उनके परम भक्त बालक बल्लाल के नाम पर पड़ा। यह कथा भक्ति की उस अटूट शक्ति को दर्शाती है जिसके सामने स्वयं भगवान को झुकना पड़ता है।
प्राचीन काल में पाली गाँव में कल्याण नामक एक धनी व्यापारी रहता था। उसका पुत्र बल्लाल बचपन से ही गणेश-भक्ति में अत्यंत लीन रहता था। वह अपने संगी-साथियों के साथ जंगल में जाकर पत्थर को गणेश-रूप में स्थापित करता और घंटों पूजा, भजन तथा कीर्तन में मग्न रहता। उसकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि उसके सभी मित्र भी उसके साथ पूजा में डूब जाते और घर लौटना भूल जाते।
जब गाँव के बच्चे कई दिनों तक घर नहीं लौटे, तो चिंतित माता-पिता व्यापारी कल्याण के पास शिकायत लेकर पहुँचे कि उनका बेटा बच्चों को बहका रहा है। क्रोध से भरा कल्याण जंगल में पहुँचा, जहाँ बल्लाल पूजा में तल्लीन था। पिता ने न धर्म देखा, न भक्ति का आदर किया — उसने पूजा-सामग्री को बिखेर दिया, गणेश-मूर्ति के रूप में स्थापित पत्थर को उठाकर दूर फेंक दिया, और बालक बल्लाल को वृक्ष से बाँधकर निर्दयता से पीटा।
घायल और रस्सियों में बँधा बल्लाल पीड़ा में भी अपने आराध्य को ही पुकारता रहा। वह रोता रहा, "हे गणेश! मैं तो केवल आपकी आराधना कर रहा था, फिर मुझे यह दंड क्यों?" उसकी अश्रुपूरित पुकार और अडिग श्रद्धा को देखकर विघ्नहर्ता गणेश का हृदय द्रवित हो उठा। भक्त की करुण पुकार सुनकर भगवान स्वयं एक ब्राह्मण के रूप में वहाँ प्रकट हुए, बालक के बंधन खोले और उसके घावों पर हाथ फेरकर उसे स्वस्थ कर दिया।
गणेश ने प्रसन्न होकर बल्लाल से वर माँगने को कहा। भक्त बल्लाल ने कोई सांसारिक सुख नहीं माँगा, बल्कि प्रार्थना की — "हे प्रभु! आप इसी स्थान पर सदा के लिए निवास करें और मेरे नाम से यहाँ विराजें, ताकि आपके भक्तों का कल्याण होता रहे।" भगवान ने "तथास्तु" कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार की और वहीं शिला-रूप में स्थापित हो गए। इस प्रकार वे "बल्लालेश्वर" कहलाए।
कहते हैं कि जिस पत्थर को कल्याण ने फेंका था, वह भी वहीं स्थापित हो गया और आज उसे "ढुंढी विनायक" के नाम से पूजा जाता है। बल्लालेश्वर की मूर्ति पूर्वाभिमुख है और उनकी सूंड बाईं ओर है। इस मंदिर की एक और विशेषता यह है कि यहाँ गणेश को नैवेद्य में बेसन के लड्डू नहीं, बल्कि मोदक का विशेष भोग लगता है, और सूर्य की किरणें एक विशेष अवसर पर सीधे मूर्ति पर पड़ती हैं।
बल्लालेश्वर की महिमा अनंत है। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान न धन देखते हैं, न आयु और न विद्वत्ता — वे केवल सच्ची भक्ति और निष्कपट प्रेम को देखते हैं। एक बालक की अटूट श्रद्धा ने स्वयं गणपति को उसके नाम से बँधने पर विवश कर दिया। जो भी भक्त इस पावन धाम में सच्चे हृदय से आता है, बल्लालेश्वर उसके सभी कष्ट हर लेते हैं। जय बल्लालेश्वर, गणपति बाप्पा मोरया।