
मयूरेश्वर, मोरगाँव — सिंधुरासुर वध
Mayureshwar, Morgaon — Sindhurasur Vadh
महाराष्ट्र की पावन भूमि पर, पुणे जनपद के निकट कर्हा नदी के तट पर बसा मोरगाँव अष्टविनायक तीर्थयात्रा का प्रथम एवं परम पवित्र स्थान है। यहाँ श्रीगणेश "मयूरेश्वर" के रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि यह स्थल स्वयं देवताओं और ऋषियों की तपस्थली रहा है, और गणेश-उपासना का आदि केंद्र माना जाता है। जो भक्त अष्टविनायक की परिक्रमा करता है, वह मोरगाँव से ही आरंभ करता है और अंत में पुनः यहीं लौटकर यात्रा पूर्ण करता है।
प्राचीन कथा के अनुसार सिंधु नामक एक भयंकर असुर हुआ। उसने कठोर तपस्या करके ऐसा वरदान प्राप्त किया कि उसके पेट में अमृत का कुंभ स्थापित हो गया, जिसके कारण जब तक वह अमृत सुरक्षित रहे, उसे मारना असंभव हो जाए। इस वरदान के मद में चूर होकर सिंधुरासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। उसने ऋषियों के यज्ञ भंग किए, देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और धर्म का लोप करने लगा। पीड़ित देवगण और मुनि अपनी रक्षा की गुहार लेकर भगवान के शरणागत हुए।
देवताओं की प्रार्थना पर विघ्नहर्ता गणेश ने मयूर अर्थात् मोर को अपना वाहन बनाकर अवतार लिया, इसीलिए उनका नाम "मयूरेश्वर" पड़ा। छह भुजाओं वाले तेजस्वी रूप में वे मोर पर सवार होकर सिंधुरासुर से युद्ध करने निकले। यह घोर संग्राम कई दिनों तक चला। असुर की सेना का संहार करते हुए गणेश ने अनेक दैत्यों को धराशायी किया, किंतु सिंधु अपने अमृत-कवच के बल पर टिका रहा।
अंत में विवेकवान गजानन ने असुर के वरदान का रहस्य समझ लिया। उन्होंने युद्ध की रणनीति बदलकर सीधे सिंधुरासुर के उदर पर प्रहार किया और उसे चीर डाला। जैसे ही उसके पेट में स्थित अमृत का कुंभ फूटा, असुर का बल क्षीण हो गया। तत्पश्चात मयूरेश्वर ने अपने दिव्य आयुध से सिंधु का वध कर दिया। इस विजय से तीनों लोकों में आनंद की लहर दौड़ गई और देवताओं ने पुष्प-वर्षा कर भगवान की जय-जयकार की।
युद्ध के पश्चात मयूरेश्वर ने अपना मयूर-वाहन वहीं छोड़ दिया और उस स्थान को अपने चरणों से पवित्र किया। कहते हैं कि इसी कारण इस ग्राम का नाम "मोरगाँव" पड़ा, क्योंकि यहाँ मोर बहुतायत में रहते थे और यह मोर के आकार जैसी भूमि पर बसा है। यहाँ की मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है, जिसकी सूंड बाईं ओर मुड़ी है और नेत्रों तथा नाभि में हीरे जड़े हुए हैं।
मयूरेश्वर मंदिर की रचना भी अद्भुत है — इसके चारों कोनों पर चार मीनारें हैं जो चार युगों की प्रतीक मानी जाती हैं, और परिसर के द्वार पर विशाल नंदी की प्रतिमा है, जो यहाँ की एक विशेष परंपरा को दर्शाती है। ऐसा कहा जाता है कि गणपति के इस धाम में जो श्रद्धा से माथा टेकता है, उसके सारे विघ्न सिंधुरासुर की भाँति नष्ट हो जाते हैं।
आज भी लाखों भक्त मोरगाँव आकर मयूरेश्वर के दर्शन करते हैं और अपने जीवन के अमंगल तथा बाधाओं के नाश की प्रार्थना करते हैं। यह प्रथम पीठ भक्तों को यह पावन संदेश देता है कि अहंकार और अधर्म रूपी असुर चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो, भक्ति और श्रद्धा के आगे उसका पतन निश्चित है। मयूरेश्वर की महिमा अनंत है — जय मयूरेश्वर, जय गणपति बाप्पा मोरया।