Vibhishan Se Bhent

विभीषण से भेंट

Vibhishan Se Bhent

लंका के भवनों की खोज करते हुए हनुमान जी एक ऐसे भवन के पास पहुँचे, जो अन्य राक्षसों के भवनों से बिल्कुल अलग था। वहाँ का वातावरण शान्त और पवित्र था। भवन के द्वार पर तुलसी के पौधे लगे थे, भीतर से हरि-नाम का मधुर स्वर आ रहा था और चारों ओर एक दिव्य शान्ति फैली हुई थी। यह देखकर हनुमान जी चकित रह गए कि राक्षसों की इस नगरी में ऐसा भक्ति-भाव किसका हो सकता है।

हनुमान जी ने विचार किया कि इस राक्षसकुल में भी कोई ऐसा भक्त अवश्य है जो प्रभु का नाम स्मरण करता है। यह भवन विभीषण का था, जो रावण का छोटा भाई होकर भी परम धर्मात्मा और श्रीराम का अनन्य भक्त था। हनुमान जी ने निश्चय किया कि इस सज्जन से भेंट करके सीता माता के विषय में जानकारी लेनी चाहिए।

प्रातःकाल विभीषण जब जागे और उन्होंने "जय श्रीराम" कहकर प्रभु का स्मरण किया, तो हनुमान जी ने एक ब्राह्मण का रूप धारण कर उनके पास पहुँचकर उनका परिचय पूछा। विभीषण ने भी विनम्रता से अपना परिचय दिया और कहा कि मैं राक्षसकुल में जन्मा हूँ, परंतु मेरा मन सदा श्रीराम के चरणों में लगा रहता है। इस अधर्मी नगरी में मैं मछली की भाँति अकेला और दुःखी जीवन बिता रहा हूँ।

विभीषण के मुख से प्रभु के प्रति ऐसा प्रेम सुनकर हनुमान जी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना वास्तविक परिचय देते हुए बताया कि वे श्रीराम के दूत हैं और सीता माता की खोज में लंका आए हैं। यह सुनकर विभीषण का हृदय आनन्द से भर गया, मानो मरुभूमि में उन्हें अमृत की धारा मिल गई हो। दोनों प्रभु-भक्तों में परस्पर गहरा स्नेह और विश्वास उत्पन्न हो गया।

विभीषण ने हनुमान जी को बताया कि माता सीता को रावण ने नगर के बाहर अशोक वाटिका में रखा है, जहाँ अनेक राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं। परंतु माता अत्यन्त शोकाकुल हैं और प्रभु के वियोग में दुःखी हैं। विभीषण ने हनुमान जी से प्रार्थना की कि वे माता को धैर्य बँधाएँ और उन्हें प्रभु के शीघ्र आने का विश्वास दिलाएँ।

हनुमान जी ने विभीषण को आश्वस्त किया कि प्रभु श्रीराम अवश्य ही सज्जनों की रक्षा करते हैं और दुष्ट रावण का अंत निश्चित है। उन्होंने विभीषण को धीरज बँधाया कि उनकी भक्ति व्यर्थ नहीं जाएगी और समय आने पर प्रभु स्वयं उन्हें अपनी शरण में लेंगे। इस भेंट ने हनुमान जी को उनके कार्य की सही दिशा दे दी।

भाव — सच्चे भक्त की पहचान उसके कुल से नहीं, उसके हृदय के प्रेम से होती है; भक्त सदा भक्त का सहायक बनता है।

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