
सिंहिका वध — छाया पकड़ने वाली राक्षसी
Sinhika Vadh — Chhaya Pakadne Wali Rakshasi
सुरसा से आशीर्वाद पाकर हनुमान जी पुनः आकाश-मार्ग से आगे बढ़े। समुद्र के जल में एक भयंकर राक्षसी सिंहिका रहती थी, जिसे एक विचित्र शक्ति प्राप्त थी। वह आकाश में उड़ते हुए किसी भी जीव की जल पर पड़ने वाली छाया को पकड़ लेती और उसे खींचकर अपने पास बुला लेती थी, फिर उसे निगल जाती थी। यह उसकी विचित्र और भयावह माया थी।
जब हनुमान जी आकाश में उड़ रहे थे, तब उनकी विशाल छाया समुद्र के जल पर पड़ी। सिंहिका ने उस छाया को देखा और अपनी शक्ति से उसे पकड़ लिया। हनुमान जी को लगा कि उनका वेग अचानक रुक-सा गया है, मानो कोई अदृश्य शक्ति उन्हें पीछे खींच रही हो। उन्होंने नीचे और चारों ओर दृष्टि दौड़ाई कि आखिर यह किसकी माया है।
नीचे देखने पर हनुमान जी ने जल में उस विशाल राक्षसी को देखा, जिसका मुख विकराल था और जो उनकी छाया पकड़कर उन्हें अपनी ओर खींच रही थी। हनुमान जी ने तुरंत समझ लिया कि यह वही छाया-ग्राही राक्षसी सिंहिका है, जिसके विषय में उन्हें बताया गया था। उन्होंने मन में प्रभु श्रीराम का स्मरण किया और उससे निपटने का निश्चय किया।
सिंहिका ने अपना विशाल मुख खोला और हनुमान जी को निगलने के लिए ऊपर उठी। हनुमान जी ने भी अपना शरीर उसी के अनुरूप विशाल कर लिया और साहसपूर्वक उसके खुले मुख में प्रवेश कर गए। भीतर पहुँचते ही उन्होंने अपने तीक्ष्ण नखों से उस राक्षसी के मर्मस्थलों को चीर डाला। सिंहिका के शरीर के भीतर ही हनुमान जी ने ऐसा प्रहार किया कि वह तड़पने लगी।
फिर हनुमान जी बिजली की गति से पुनः अपना शरीर छोटा कर उसके मुख से बाहर निकल आए। सिंहिका अपने प्राण छोड़कर समुद्र के जल में गिर पड़ी और उसका विशाल शरीर लहरों में विलीन हो गया। इस प्रकार हनुमान जी ने बल और बुद्धि दोनों के संयोग से उस मायावी राक्षसी का अंत किया और अपने मार्ग को निष्कंटक बना लिया।
आकाश से देवता यह देखकर हनुमान जी की प्रशंसा करने लगे। उन्होंने कहा कि जो कठिन कार्य को धैर्य, बुद्धि, स्थिरता और पराक्रम — इन चारों गुणों से करता है, उसे कोई सिद्धि दुर्लभ नहीं। हनुमान जी में ये चारों गुण पूर्ण रूप से विद्यमान थे।
भाव — माया कितनी भी बड़ी क्यों न हो, धैर्य और पराक्रम के आगे टिक नहीं पाती; प्रभु-स्मरण ही रक्षा है।