
सौ योजन समुद्र लाँघना
Sau Yojan Samudra Langhna
सुग्रीव की आज्ञा से जब वानरों का दल दक्षिण दिशा में सीता जी की खोज करते हुए समुद्र के किनारे पहुँचा, तो सामने फैला अथाह जल देखकर सबके मन बैठ गए। सौ योजन चौड़ा वह महासागर लहरों से गरजता हुआ ऐसे प्रतीत होता था मानो आकाश और धरती को अलग करने वाली कोई अलंघ्य सीमा हो। किसी वानर में इतनी शक्ति न थी कि उस पार जा सके। तभी जाम्बवान ने हनुमान जी की ओर देखा और उन्हें उनके जन्म का, उनके बल का, और उनके भीतर सोई हुई अपार सामर्थ्य का स्मरण कराया।
जाम्बवान के वचन सुनते ही हनुमान जी को अपनी शक्ति का बोध हुआ। उन्होंने गर्जना की और अपना शरीर पर्वत के समान विशाल कर लिया। उनका रोम-रोम उत्साह से भर उठा, नेत्रों में तेज चमकने लगा और मुख पर प्रभु श्रीराम का स्मरण झलकने लगा। उन्होंने सब वानरों को आश्वस्त किया कि वे अवश्य समुद्र लाँघकर सीता माता का पता लगाएँगे और लौटकर शुभ समाचार देंगे।
महेन्द्र पर्वत पर चढ़कर हनुमान जी ने छलाँग लगाने की तैयारी की। उनके पैरों के दबाव से पर्वत काँप उठा, उसमें से जल-धाराएँ फूट पड़ीं और वृक्ष झुक गए। प्रभु श्रीराम को हृदय में धारण कर, "जय श्रीराम" की गर्जना के साथ हनुमान जी ने आकाश की ओर छलाँग लगाई। उनके वेग से समुद्र का जल उछल पड़ा और आकाश के पक्षी भी चकित रह गए।
आकाश में उड़ते हुए हनुमान जी ऐसे शोभायमान थे मानो पंखों वाला कोई पर्वत उड़ चला हो। उनकी छाया समुद्र पर पड़ती तो जल के जीव विस्मित होते। देवता, गन्धर्व और ऋषिगण आकाश से उनका यह अद्भुत पराक्रम देखकर पुष्प बरसाने लगे। सूर्य के समान तेजस्वी हनुमान जी बिना थके, बिना रुके, केवल राम-नाम के बल पर आगे बढ़ते रहे।
मार्ग में अनेक बाधाएँ आईं, पर हनुमान जी का संकल्प अडिग रहा। वे जानते थे कि यह केवल एक समुद्र नहीं, बल्कि प्रभु के कार्य की परीक्षा है। उनके मन में न भय था, न संशय — केवल एक ही भाव था कि माता सीता की खोज पूरी हो और स्वामी श्रीराम का दुःख दूर हो। इसी भक्ति और शक्ति के बल पर वह विशाल महासागर उनके लिए गोपद के समान छोटा हो गया।
हनुमान जी का यह सौ योजन समुद्र लाँघना केवल शारीरिक बल का चमत्कार नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण की विजय है। जब हृदय में प्रभु का नाम हो, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
भाव — जहाँ राम-नाम का बल हो, वहाँ कोई सागर बाधा नहीं बनता; भक्ति से बड़ी कोई शक्ति नहीं।