
सुरसा की परीक्षा — सूक्ष्म रूप की चतुराई
Sursa Ki Pariksha — Sukshma Roop Ki Chaturai
हनुमान जी अभी आगे बढ़े ही थे कि देवताओं ने उनकी बुद्धि और बल की परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने नागमाता सुरसा से प्रार्थना की कि वह राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान जी का मार्ग रोके, ताकि यह देखा जा सके कि श्रीराम का यह दूत कितना विवेकी और साहसी है। सुरसा ने विशाल और भयंकर रूप धारण किया और समुद्र के बीच प्रकट होकर हनुमान जी का रास्ता रोक लिया।
सुरसा ने गरजते हुए कहा कि आज देवताओं ने तुम्हें मेरा आहार बनाया है, इसलिए तुम मेरे मुख में प्रवेश करो, यही विधान है। उसका मुख किसी विशाल गुफा के समान खुला हुआ था। हनुमान जी ने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा कि मैं प्रभु श्रीराम का कार्य लेकर सीता माता की खोज में जा रहा हूँ; तुम मुझे जाने दो, कार्य पूरा कर मैं स्वयं लौटकर तुम्हारे मुख में आ जाऊँगा।
पर सुरसा नहीं मानी और उसने कहा कि यह वरदान है कि जो मेरे सामने आए, वह मेरे मुख से बिना निकले नहीं जा सकता। हनुमान जी ने देखा कि यह तो हठ है, अतः उन्होंने बल के साथ बुद्धि का प्रयोग करने का निश्चय किया। उन्होंने अपना शरीर बढ़ाना आरम्भ किया। सुरसा ने भी अपना मुख उसी अनुपात में और अधिक फैला लिया।
हनुमान जी जितना अपना रूप बड़ा करते, सुरसा उतना ही अपना मुख विशाल कर लेती। यह देखकर हनुमान जी ने एक क्षण में युक्ति निकाली। उन्होंने अचानक अपना शरीर अत्यन्त छोटा, अँगूठे के समान सूक्ष्म कर लिया और बिजली की भाँति सुरसा के मुख में प्रवेश कर, तुरंत बाहर निकल आए। पलक झपकते ही वे मुख के भीतर से होकर बाहर आ खड़े हुए और बोले — हे देवि, मैं तुम्हारे मुख में प्रवेश कर बाहर आ गया, तुम्हारा वचन पूरा हो गया।
सुरसा हनुमान जी की इस चतुराई, विनम्रता और साहस को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई। उसने अपना असली रूप प्रकट किया और आशीर्वाद देते हुए कहा कि मैं तो देवताओं की प्रेरणा से तुम्हारी परीक्षा लेने आई थी, और तुम इसमें पूर्ण उत्तीर्ण हुए। तुम्हारा बल और बुद्धि दोनों अद्भुत हैं; जाओ, तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा।
इस प्रसंग में हनुमान जी ने दिखाया कि केवल बल ही नहीं, विवेक और नम्रता भी बड़ी शक्ति है। जो अवसर के अनुसार बुद्धि का प्रयोग करता है, वही विजयी होता है।
भाव — जहाँ बल के साथ बुद्धि और विनम्रता हो, वहाँ बड़ी से बड़ी बाधा भी सरल हो जाती है।