
मैनाक पर्वत का आतिथ्य
Mainak Parvat Ka Aatithya
हनुमान जी आकाश-मार्ग से समुद्र लाँघते जा रहे थे कि समुद्र के हृदय में एक विचार उठा। समुद्र ने सोचा कि श्रीराम के इस महान दूत को थोड़ा विश्राम मिलना चाहिए, ताकि वे तनिक थकान मिटाकर आगे बढ़ सकें। यह विचार आते ही समुद्र ने अपने भीतर छिपे मैनाक पर्वत को स्मरण किया, जो सोने का बना हुआ एक दिव्य पर्वत था और जल के भीतर विश्राम कर रहा था।
समुद्र ने मैनाक से कहा कि पूर्वकाल में जब इन्द्र ने पर्वतों के पंख काट दिए थे, तब वायुदेव ने तुम्हारी रक्षा की थी और तुम्हें समुद्र में शरण दी थी। आज उसी वायुदेव के पुत्र हनुमान यहाँ से जा रहे हैं। अतः तुम जल से ऊपर उठकर उन्हें विश्राम दो और अपने आतिथ्य से उनके पूर्वज के ऋण को चुकाओ।
समुद्र की प्रेरणा से मैनाक पर्वत जल को चीरता हुआ ऊपर उठ आया। उसके स्वर्णिम शिखर सूर्य की भाँति चमकने लगे और उस पर सुन्दर वृक्ष, फल और झरने शोभा दे रहे थे। मैनाक ने अपना मानवरूप धारण कर हनुमान जी से प्रार्थना की कि वे उस पर विश्राम करें, मधुर फल ग्रहण करें और थोड़ा थककर पुनः अपनी यात्रा आरम्भ करें।
हनुमान जी ने मैनाक पर्वत का यह स्नेह देखकर प्रसन्नता से उसे स्पर्श किया। उन्होंने अत्यन्त कोमल और विनम्र वाणी में उत्तर दिया कि तुम्हारा आतिथ्य मैंने हृदय से स्वीकार कर लिया, पर मैं प्रभु श्रीराम का कार्य लेकर चला हूँ और जब तक वह कार्य पूरा न हो, तब तक मुझे कहीं ठहरना उचित नहीं। जिसने प्रभु का कार्य हाथ में लिया हो, उसे विश्राम शोभा नहीं देता।
इतना कहकर हनुमान जी ने मैनाक को केवल हाथ से स्पर्श कर, उसका सम्मान करते हुए आगे उड़ान भरी। मैनाक को उनके इस त्याग और कर्तव्य-निष्ठा पर अपार आदर हुआ। देवताओं ने भी हनुमान जी की इस निःस्वार्थता की सराहना की, क्योंकि थकान होने पर भी उन्होंने विश्राम को नहीं, कर्तव्य को चुना।
यह प्रसंग सिखाता है कि सच्चा सेवक स्वामी के कार्य को अपने सुख से बड़ा मानता है। मैनाक का प्रेम भी धन्य है, पर हनुमान जी की कर्तव्य-निष्ठा उससे भी ऊँची है।
भाव — प्रभु का कार्य हाथ में हो तो विश्राम भी बाधा लगता है; सेवा में ही सच्चा सुख है।