
लंकिनी को परास्त करना
Lankini Ko Parast Karna
सिंहिका का वध कर हनुमान जी अंततः समुद्र पार कर लंका के तट पर पहुँच गए। सामने त्रिकूट पर्वत पर स्वर्ण से बनी रावण की भव्य नगरी लंका जगमगा रही थी। हनुमान जी ने सोचा कि यदि मैं अपने विशाल रूप में नगर में प्रवेश करूँगा तो राक्षस सतर्क हो जाएँगे। अतः उन्होंने अपना शरीर एक छोटे-से मच्छर के समान सूक्ष्म कर लिया और रात्रि के समय चुपके से नगर के द्वार की ओर बढ़े।
लंका नगरी की रक्षा के लिए द्वार पर लंकिनी नामक एक भयंकर राक्षसी नियुक्त थी। जब हनुमान जी नगर में प्रवेश करने लगे, तो लंकिनी ने उन्हें रोक लिया और कठोर स्वर में पूछा कि तू कौन है जो चोर की भाँति मेरी नगरी में घुसने की चेष्टा कर रहा है? मुझे परास्त किए बिना यहाँ कोई प्रवेश नहीं पा सकता।
हनुमान जी ने उसकी उपेक्षा कर आगे बढ़ने का प्रयास किया, तो लंकिनी ने उन पर प्रहार किया। इस पर हनुमान जी ने भी संयम रखते हुए, स्त्री जानकर अपने बल का बहुत थोड़ा-सा ही प्रयोग किया और उसे एक हल्का-सा घूँसा मारा। परंतु उस एक ही प्रहार से लंकिनी लड़खड़ाकर गिर पड़ी और उसके मुख से रक्त बहने लगा।
गिरते ही लंकिनी को एक पुरानी भविष्यवाणी का स्मरण हो आया। ब्रह्मा जी ने कभी उससे कहा था कि जिस दिन कोई वानर तुझे परास्त कर देगा, उसी दिन से राक्षसों का विनाश और लंका का पतन आरम्भ हो जाएगा। अपनी हार में उसने उस भविष्यवाणी को साकार होते देखा और समझ गई कि अब रावण के अन्त का समय निकट है।
लंकिनी ने विनम्र होकर हाथ जोड़े और हनुमान जी से कहा कि हे वीर, तुम अवश्य ही किसी महान कार्य के लिए आए हो। तुम निःशंक होकर नगर में प्रवेश करो और अपना कार्य सिद्ध करो। मैंने अपनी आँखों से रावण के विनाश का संकेत देख लिया है। यह कहकर उसने हनुमान जी को आदरपूर्वक आगे जाने दिया।
हनुमान जी ने लंकिनी को नमस्कार कर, प्रभु श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका में प्रवेश किया। इस प्रकार नगर की पहली रक्षिका भी उनके तेज और बल के आगे नतमस्तक हो गई, और उनका मार्ग सीता माता तक पहुँचने के लिए खुल गया।
भाव — अधर्म की रक्षा करने वाली शक्ति भी सत्य के दूत के आगे झुक जाती है; प्रभु का दूत सदा विजयी होता है।