
वापसी और राम को समाचार देना
Vapasi Aur Ram Ko Samachar Dena
माता सीता से चूड़ामणि और संदेश लेकर हनुमान जी ने पुनः "जय श्रीराम" की गर्जना के साथ समुद्र लाँघने के लिए छलाँग लगाई। इस बार उनके हृदय में सीता माता के दर्शन कर लेने का संतोष और अपना कार्य सिद्ध कर लेने का हर्ष था। वे प्रसन्न मन से आकाश-मार्ग से उड़ते हुए, शीघ्र ही समुद्र के इस पार लौट आए, जहाँ अन्य वानर उनकी प्रतीक्षा में व्याकुल बैठे थे।
हनुमान जी को लौटता देख सारे वानरों के हर्ष का ठिकाना न रहा। जब उन्होंने बताया कि उन्होंने माता सीता के दर्शन कर लिए हैं और वे सकुशल हैं, तो सब वानर आनन्द से गर्जना करने लगे। सबने मिलकर हनुमान जी की जय-जयकार की और उनके इस असंभव कार्य को संभव करने के अद्भुत पराक्रम की सराहना की। सबके मन में एक नई आशा और उत्साह भर गया।
वापसी के मार्ग में जब सारे वानर मधुवन नामक सुग्रीव के उपवन के पास से गुजरे, तब सफलता के उल्लास में उन्होंने वहाँ के मीठे फल और मधु का आनन्द लिया। इसके पश्चात् वे सब हर्ष से भरे हुए, तीव्र गति से किष्किन्धा की ओर बढ़े, जहाँ प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण जी और सुग्रीव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
हनुमान जी जब प्रभु श्रीराम के समक्ष पहुँचे, तो उन्होंने अत्यन्त विनम्रता से प्रणाम कर सबसे पहले वही शुभ समाचार दिया — "माता सीता के दर्शन हो गए।" इन शब्दों को सुनते ही प्रभु श्रीराम के नेत्रों से हर्ष के आँसू बह निकले। महीनों से जिस समाचार की वे प्रतीक्षा कर रहे थे, वह सुनकर उनका व्याकुल हृदय शान्त हो गया।
हनुमान जी ने प्रभु को लंका, अशोक वाटिका, सीता माता की दशा, उनके अटल पातिव्रत्य और रावण के अत्याचारों का सारा वृत्तांत विस्तार से सुनाया। फिर उन्होंने माता द्वारा दी गई चूड़ामणि प्रभु के चरणों में समर्पित की और वह गुप्त संदेश भी सुनाया, जिसे केवल प्रभु और सीता जी ही जानते थे। चूड़ामणि को हृदय से लगाकर प्रभु श्रीराम भाव-विभोर हो गए।
प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी को अपने हृदय से लगा लिया और कहा कि हे हनुमान, तुमने जो कार्य किया है, वैसा कार्य न किसी ने पहले किया, न कर सकता है। तुमने मुझ पर जो उपकार किया है, उसका बदला मैं कैसे चुका सकूँगा। प्रभु के इस स्नेह और आशीर्वाद को पाकर हनुमान जी धन्य हो गए और उनकी सारी थकान और परिश्रम सफल हो गया।
भाव — भक्त का सबसे बड़ा पुरस्कार प्रभु का स्नेह और आशीर्वाद है; निष्काम सेवा ही सच्ची भक्ति है।