
उषा-अनिरुद्ध और बाणासुर युद्ध
Usha-Aniruddh Aur Baanasur Yuddh
शोणितपुर का राजा बाणासुर बलि का पुत्र और सहस्र भुजाओं वाला महाबली दैत्य था। वह भगवान शिव का परम भक्त था और शिव ने प्रसन्न होकर उसे अनेक वरदान दिए थे। अपने बल और वरदानों के अभिमान में बाणासुर को अपने पराक्रम दिखाने के लिए योग्य शत्रु की खोज रहती थी। उसकी एक अत्यंत रूपवती पुत्री थी, जिसका नाम उषा था।
एक रात्रि उषा ने स्वप्न में एक अत्यंत सुंदर राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। जागने पर वह उस अनजाने राजकुमार के वियोग में व्याकुल हो उठी। उसकी सखी चित्रलेखा, जो एक कुशल चित्रकार और मंत्र-सिद्धा थी, ने अनेक राजकुमारों के चित्र बनाकर उषा को दिखाए। अंत में जब उसने भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र, अनिरुद्ध का चित्र बनाया, तो उषा ने उन्हें ही अपने स्वप्न का राजकुमार पहचाना।
चित्रलेखा ने अपनी योगशक्ति से द्वारका से अनिरुद्ध को उषा के महल में ले आई। उषा और अनिरुद्ध एक-दूसरे के प्रेम में बँध गए और गुप्त रूप से रहने लगे। जब बाणासुर को यह ज्ञात हुआ कि उसके संरक्षित अंतःपुर में एक युवक है, तो वह क्रोध से भर उठा। उसने अनिरुद्ध पर आक्रमण किया, परन्तु अनिरुद्ध ने वीरता से बहुत देर तक युद्ध किया। अंततः बाणासुर ने उन्हें नागपाश में बाँध लिया।
इधर द्वारका में जब अनिरुद्ध बहुत दिनों तक नहीं लौटे, तब देवर्षि नारद ने भगवान श्रीकृष्ण को सारा वृत्तांत बताया। भगवान बलराम और प्रद्युम्न के साथ विशाल सेना लेकर शोणितपुर की ओर चल पड़े। भगवान की सेना ने नगरी को घेर लिया। बाणासुर की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव और उनके गण युद्ध में उतरे। इस प्रकार एक ओर श्रीकृष्ण तथा दूसरी ओर भगवान शिव आमने-सामने हुए।
घोर संग्राम हुआ, किन्तु दोनों देव अपने भक्तों की मर्यादा जानते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर की सहस्र भुजाओं में से अधिकांश को अपने चक्र से काट दिया। जब बाणासुर का अभिमान चूर हुआ और वह असहाय हो गया, तब भगवान शिव ने श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की प्रार्थना की। भगवान ने शिव का मान रखते हुए बाणासुर को अभयदान दिया और केवल चार भुजाएँ छोड़ दीं। बाणासुर का गर्व टूट गया और वह भगवान की शरण में आ गया।
तत्पश्चात् अनिरुद्ध को नागपाश से मुक्त किया गया, और उषा तथा अनिरुद्ध का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ। भगवान उन्हें ससम्मान द्वारका ले आए। उषा-अनिरुद्ध की यह कथा दिखाती है कि सच्चा प्रेम अंततः प्रभु की कृपा से पूर्ण होता है, और अभिमान चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, प्रभु की शरण में आकर ही उसका कल्याण होता है। भक्तवत्सल भगवान अपने और शिव के भक्त — दोनों की मर्यादा साथ-साथ निभाते हैं।