
स्यमंतक मणि की कथा — जाम्बवती और सत्यभामा से विवाह
Syamantak Mani Ki Katha — Jambavati Aur Satyabhama Se Vivah
द्वारका में यादवश्रेष्ठ सत्राजित सूर्यदेव के परम भक्त थे। सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें स्यमंतक नामक एक दिव्य मणि प्रदान की। यह मणि प्रतिदिन आठ भार स्वर्ण देती थी और जहाँ रहती, वहाँ रोग, दुर्भिक्ष और अमंगल का नाश करती। सत्राजित इस मणि को धारण कर द्वारका आए, तो लोग उनके तेज को देखकर उन्हें साक्षात् सूर्य समझ बैठे।
एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को गले में धारण कर वन में शिकार के लिए गया। वन में एक सिंह ने प्रसेन को मार डाला और मणि ले ली। तभी ऋक्षराज जाम्बवान ने उस सिंह को मारकर मणि अपनी गुफा में ले जाकर अपने बालक को खेलने के लिए दे दी। इधर द्वारका में जब प्रसेन नहीं लौटा, तो सत्राजित ने संदेह किया कि श्रीकृष्ण ने ही मणि के लोभ में उसका वध किया है। यह मिथ्या आरोप भगवान पर एक कलंक बन गया।
अपने ऊपर लगे इस दोष को मिटाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण स्वयं वन में गए। वहाँ उन्होंने प्रसेन और सिंह के शव देखे, और सिंह तथा जाम्बवान के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए एक गुफा में प्रवेश किया। वह गुफा जाम्बवान की थी। मणि को लेकर भगवान और जाम्बवान के बीच अट्ठाईस दिनों तक घोर युद्ध चला। धीरे-धीरे जाम्बवान का बल क्षीण होने लगा।
तब जाम्बवान को स्मरण हुआ कि यह साधारण पुरुष नहीं हो सकता। उन्हें बोध हुआ कि यह तो साक्षात् श्रीराम ही हैं, जिनकी वे त्रेतायुग में सेवा कर चुके थे। भाव-विह्वल होकर उन्होंने भगवान की स्तुति की और क्षमा माँगी। भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया, उनका सिर सहलाया, और स्यमंतक मणि लौटाने को कहा। जाम्बवान ने मणि के साथ-साथ अपनी पुत्री जाम्बवती को भी भगवान को समर्पित कर दिया।
भगवान जाम्बवती और मणि को लेकर द्वारका लौटे। उन्होंने भरी सभा में सत्राजित को मणि लौटाकर अपनी निर्दोषता प्रकट की। सत्राजित लज्जित हुए और अपने मिथ्या आरोप के प्रायश्चित्तस्वरूप उन्होंने अपनी सुंदर पुत्री सत्यभामा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण से कर दिया, और मणि भी समर्पित करनी चाही। भगवान ने मणि तो लौटा दी, केवल सत्यभामा को स्वीकार किया।
स्यमंतक मणि की यह कथा सिखाती है कि सत्य कितनी भी देर से प्रकट हो, अंततः विजयी होता है। भगवान पर लगे मिथ्या आरोप भी उनकी लीला में भक्तों के उद्धार का कारण बन जाते हैं। जाम्बवान की पुरानी भक्ति भी इसी लीला में फलित हुई। इससे यह भाव मिलता है कि सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती, वह युगों के बाद भी प्रभु से मिलन कराती है।