
जरासंध के सत्रह आक्रमण
Jarasandh Ke Satrah Aakraman
मथुरा में कंस के वध के पश्चात् जब भगवान श्रीकृष्ण ने अन्यायी राजा का अंत किया, तो कंस की दोनों रानियाँ — अस्ति और प्राप्ति — अपने पिता मगधराज जरासंध के पास जाकर विलाप करने लगीं। जरासंध अत्यंत बलशाली और अहंकारी सम्राट था। अपनी पुत्रियों का दुःख देखकर वह क्रोध से भर उठा और उसने प्रतिज्ञा की कि वह पृथ्वी को यादवों से रहित कर देगा। इस प्रतिज्ञा के साथ वह विशाल सेना लेकर मथुरा पर चढ़ आया।
जरासंध ने तेईस अक्षौहिणी सेना के साथ मथुरा को चारों ओर से घेर लिया। नगरवासी भयभीत हो उठे, परन्तु श्रीकृष्ण और बलराम शांत रहे। भगवान ने विचार किया कि यह अवसर पृथ्वी का भार हरने के लिए उपयुक्त है, अतः उन्होंने असुर-सेना का संहार करने का निश्चय किया। युद्ध में श्रीकृष्ण और बलराम ने अपने अद्भुत पराक्रम से जरासंध की समस्त सेना को नष्ट कर दिया और स्वयं जरासंध को बंदी बना लिया।
किन्तु भगवान ने एक विशेष लीला रची। उन्होंने जरासंध को मारा नहीं, बल्कि उसे मुक्त कर दिया। यादवों को यह विचित्र लगा, परन्तु श्रीकृष्ण जानते थे कि जरासंध की मृत्यु भीमसेन के हाथों नियत है, और यह भी कि जरासंध का जीवित रहना अनेक अधर्मी राजाओं को एक स्थान पर एकत्र करने का साधन बनेगा, जिससे उनका संहार सुगम हो जाएगा। इस दूरदर्शी नीति के कारण ही भगवान ने उसे छोड़ दिया।
अपमानित होकर जरासंध बार-बार लौटता रहा। एक बार पराजित होकर वह और अधिक सेना जुटाकर पुनः आक्रमण करता। इस प्रकार उसने सत्रह बार मथुरा पर चढ़ाई की और प्रत्येक बार उसकी सेना का विनाश हुआ। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम हर बार उसे परास्त करते रहे, परन्तु उसका जीवन सुरक्षित रखते रहे। जरासंध का अहंकार फिर भी न टूटा और वह हर पराजय के बाद नया प्रयत्न करता।
इन बार-बार के आक्रमणों से यद्यपि यादव विजयी होते रहे, परन्तु मथुरा नगरी और उसकी प्रजा बार-बार युद्ध की विभीषिका सहती रही। श्रीकृष्ण ने देखा कि प्रजा का हित इसी में है कि यादवों को किसी सुरक्षित स्थान पर बसाया जाए। इसी विचार ने आगे चलकर द्वारका नगरी की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
जरासंध के इन सत्रह आक्रमणों की कथा हमें यह भाव देती है कि भगवान की प्रत्येक लीला में गूढ़ नीति और करुणा दोनों छिपी होती हैं। वे शत्रु का तत्काल संहार करने में समर्थ होते हुए भी उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं। भक्त को इससे धैर्य और भगवान की योजना पर अटूट विश्वास रखने की शिक्षा मिलती है।