
रुक्मिणी हरण और विवाह
Rukmini Haran Aur Vivah
विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी अत्यंत रूपवती, गुणवती और साक्षात् लक्ष्मी का अंश थीं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों, पराक्रम और सौंदर्य की महिमा सुन रखी थी, और मन ही मन उन्होंने श्रीकृष्ण को ही अपना पति मान लिया था। श्रीकृष्ण ने भी रुक्मिणी के गुणों की प्रशंसा सुनी थी और उन्हें अपनी अनुरूप सहचरी माना था। दोनों के हृदय एक-दूसरे की ओर आकर्षित थे।
परन्तु रुक्मिणी के बड़े भाई रुक्मी को श्रीकृष्ण से द्वेष था। उसने अपनी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल से तय कर दिया। रुक्मिणी यह जानकर अत्यंत व्याकुल हो उठीं। उन्होंने एक विश्वस्त ब्राह्मण के हाथ श्रीकृष्ण के पास एक प्रेमपूर्ण संदेश भेजा, जिसमें उन्होंने अपने हृदय का भाव प्रकट किया और प्रार्थना की कि विवाह से पूर्व वे उन्हें आकर हर ले जाएँ। उन्होंने कुलदेवी के मंदिर-दर्शन की परंपरा का उल्लेख कर उपाय भी बताया।
ब्राह्मण के मुख से यह संदेश सुनकर भगवान श्रीकृष्ण तुरंत रथ पर सवार होकर विदर्भ की ओर चल पड़े। बलराम भी सेना लेकर उनके पीछे आए। नियत दिन जब रुक्मिणी कुलदेवी अम्बिका के मंदिर में दर्शन के लिए आईं, तो सबके देखते-देखते श्रीकृष्ण ने भरी सभा में रुक्मिणी को अपने रथ पर बैठा लिया और तीव्र गति से द्वारका की ओर चल पड़े।
शिशुपाल, जरासंध और अन्य राजा क्रोध से भरकर उनका पीछा करने लगे। बलराम और यादव-वीरों ने उन सबको युद्ध में परास्त कर दिया। रुक्मी अपनी बहन के हरण से क्रुद्ध होकर श्रीकृष्ण से भिड़ गया, परन्तु वह भी पराजित हो गया। भगवान उसका वध कर सकते थे, किन्तु रुक्मिणी की लाज और भाई-बहन के संबंध का विचार कर उन्होंने उसे केवल विरूप कर छोड़ दिया।
द्वारका पहुँचकर भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह वेद-विधि से बड़े उत्सव के साथ संपन्न हुआ। समस्त द्वारकावासी आनंदमग्न हो उठे। रुक्मिणी भगवान की पटरानी बनीं और उन्होंने अपने पातिव्रत्य, सेवा और भक्ति से भगवान के हृदय में विशेष स्थान प्राप्त किया। वे साक्षात् लक्ष्मी के रूप में द्वारका की शोभा बढ़ाती रहीं।
रुक्मिणी हरण की यह कथा प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा है। रुक्मिणी का अनन्य समर्पण दिखाता है कि जब भक्त पूर्ण श्रद्धा से भगवान को पुकारता है, तो भगवान स्वयं दौड़े चले आते हैं और उसे संसार के बंधनों से हरकर अपने पास ले जाते हैं। यही अनन्य शरणागति का परम भाव है।