
द्वारका नगरी की स्थापना
Dwarka Nagari Ki Sthapana
जरासंध के बार-बार के आक्रमणों और कालयवन के भय से मथुरा की प्रजा त्रस्त रहने लगी थी। भगवान श्रीकृष्ण की करुणा प्रजा के इस कष्ट को देख न सकी। उन्होंने विचार किया कि यादवों को किसी ऐसे स्थान पर बसाया जाए जहाँ शत्रु की पहुँच कठिन हो और प्रजा सुख-शांति से जीवन व्यतीत कर सके। इसी संकल्प के साथ उन्होंने एक अपूर्व नगरी बसाने का निश्चय किया।
भगवान ने समुद्र-देवता से प्रार्थना की कि वे नगरी बसाने के लिए कुछ भूमि प्रदान करें। समुद्र-देव ने प्रसन्न होकर बारह योजन भूमि जल से हटाकर दे दी। इसके पश्चात् भगवान ने देवशिल्पी विश्वकर्मा को स्मरण किया। विश्वकर्मा ने अपनी दिव्य शिल्पकला से उस भूमि पर एक अनुपम स्वर्णनगरी का निर्माण किया, जो चारों ओर से समुद्र से घिरी हुई थी और अत्यंत सुरक्षित थी।
यह नगरी 'द्वारका' कहलाई, क्योंकि इसके अनेक विशाल द्वार थे। इसकी शोभा अवर्णनीय थी — ऊँचे स्वर्ण-भवन, रत्नजड़ित प्राचीरें, सुंदर उपवन, सरोवर, और चौड़े राजमार्ग। नगरी में मणि-माणिक्य से सुसज्जित महल थे, जहाँ जल की व्यवस्था, वायु के झरोखे और उद्यान इस प्रकार थे कि देवलोक की अमरावती भी उसके सामने फीकी प्रतीत होती थी। द्वारका सचमुच पृथ्वी पर उतरी हुई एक दिव्य नगरी थी।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया के प्रभाव से एक ही रात्रि में समस्त मथुरावासियों को द्वारका पहुँचा दिया। प्रातःकाल जब यादव-प्रजा जागी, तो स्वयं को इस अद्भुत, सुरक्षित और सुंदर नगरी में पाकर आश्चर्यचकित और आनंदित हो उठी। अब उन्हें जरासंध या किसी शत्रु का भय नहीं रह गया था। समुद्र इस नगरी की सहज रक्षा-दीवार बन गया।
द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना राजधानी-रूप में निवास किया। यहीं से उन्होंने अनेक लीलाएँ कीं, विवाह किए, धर्म की स्थापना की और भक्तों पर कृपा बरसाई। इस नगरी में यादव सुख, समृद्धि और धर्म के साथ जीवन व्यतीत करने लगे। द्वारका भगवान की उपस्थिति से सदा पवित्र और तेजोमय बनी रही।
द्वारका-स्थापना की यह कथा हमें यह भाव देती है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए साधन-असाधन सब जुटा देते हैं। जहाँ भगवान का निवास होता है, वहाँ भय नहीं, केवल शांति और मंगल होता है। भक्त का हृदय भी यदि भगवान का निवास-स्थान बन जाए, तो वह भी द्वारका के समान सुरक्षित और आनंदमय हो जाता है।