
अष्ट पटरानियाँ — कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा, लक्ष्मणा
Ashta Patraniyaan — Kalindi, Mitravinda, Satya, Bhadra, Lakshmana
द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख पटरानियाँ मानी जाती हैं। इनमें रुक्मिणी और सत्यभामा के अतिरिक्त छह और देवियाँ थीं — जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या (नाग्नजिती), भद्रा और लक्ष्मणा। ये सभी अपने-अपने पूर्व-संचित पुण्य और अनन्य भक्ति के फलस्वरूप भगवान की सहचरी बनीं। इनमें से प्रत्येक के भगवान से मिलन की एक मधुर कथा है।
कालिंदी सूर्यदेव की पुत्री थीं। उन्होंने यमुना-तट पर घोर तपस्या की थी, इस संकल्प के साथ कि उन्हें पति के रूप में केवल भगवान श्रीकृष्ण ही प्राप्त हों। जब भगवान अर्जुन के साथ वन-विहार कर रहे थे, तब उन्होंने कालिंदी को तपस्या में लीन देखा। उनकी दृढ़ भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें स्वीकार किया और द्वारका ले जाकर विधिपूर्वक विवाह किया। कालिंदी का समर्पण एकनिष्ठ तप का उदाहरण है।
मित्रविंदा अवंती देश की राजकुमारी और भगवान की बुआ की पुत्री थीं। उनका मन भी श्रीकृष्ण में ही रमा था। परन्तु उनके भाइयों ने विरोध किया। स्वयंवर के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त प्रतिद्वंद्वी राजाओं के समक्ष उन्हें हरकर अपना बना लिया। इसी प्रकार सत्या, जिन्हें नाग्नजिती भी कहा जाता है, कोसलराज नाग्नजित की पुत्री थीं। उनके पिता ने शर्त रखी थी कि जो सात दुर्दांत बैलों को एक साथ नाथ देगा, वही सत्या का पति होगा। भगवान ने अपने सात रूप धारण कर उन सातों बैलों को क्षण भर में वश में कर लिया और सत्या से विवाह किया।
भद्रा कैकेय देश की राजकुमारी और भगवान की फुफेरी बहन थीं। उनके भाइयों ने स्वयं प्रेमपूर्वक उन्हें श्रीकृष्ण को समर्पित किया। लक्ष्मणा मद्रदेश के राजा बृहत्सेन की पुत्री थीं। उनका भी स्वयंवर हुआ, जिसमें भगवान ने अपने पराक्रम से उन्हें प्राप्त किया। इस प्रकार आठों रानियाँ भिन्न-भिन्न रीति से, किन्तु समान भक्ति-भाव से भगवान को प्राप्त हुईं।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से एक साथ आठों रानियों के महलों में एक ही समय निवास किया। प्रत्येक रानी यही मानती थी कि भगवान केवल उसी के साथ रहते हैं। भगवान सबका समान रूप से मान रखते, सबकी सेवा स्वीकार करते और सबके प्रति समान प्रेम रखते। यही उनकी दिव्य समता और अनंत रूप-धारण की लीला थी।
अष्ट पटरानियों की यह कथा दिखाती है कि भगवान अपने प्रत्येक भक्त को पूर्णता से अपनाते हैं और किसी में भेद नहीं करते। जैसे प्रत्येक रानी को भगवान का पूर्ण सान्निध्य प्राप्त था, वैसे ही प्रत्येक भक्त को भी भगवान का पूर्ण प्रेम मिलता है। इससे यह भाव मिलता है कि प्रभु की कृपा में कोई कमी नहीं, वह सबके लिए संपूर्ण है।