
कालयवन वध और मुचुकुंद की कथा — 'रणछोड़' नाम
Kaalayavan Vadh Aur Muchukund Ki Katha — 'Ranchhod' Naam
जरासंध ने अपनी बार-बार की पराजय से खिन्न होकर एक नया उपाय सोचा। उसने कालयवन नामक एक अत्यंत बलशाली और भयंकर म्लेच्छ राजा से मित्रता की। कालयवन को यह वरदान प्राप्त था कि यादव-वंश का कोई वीर उसे युद्ध में परास्त नहीं कर सकता था। जरासंध के उकसाने पर कालयवन तीन करोड़ म्लेच्छ योद्धाओं की सेना लेकर मथुरा पर चढ़ आया।
भगवान श्रीकृष्ण ने विचार किया कि यदि इस समय कालयवन और जरासंध दोनों से एक साथ युद्ध होता है, तो प्रजा को अत्यधिक कष्ट होगा। अतः उन्होंने अपनी लीला से प्रजा की रक्षा का मार्ग निकाला। पहले उन्होंने समुद्र के मध्य द्वारका नगरी का निर्माण करवाकर समस्त यादव-प्रजा को वहाँ सुरक्षित पहुँचा दिया। इसके पश्चात् वे स्वयं निःशस्त्र होकर कालयवन के सम्मुख आए।
कालयवन ने ज्यों ही उस दिव्य पुरुष को देखा, वह उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ा। परन्तु भगवान युद्ध न करके धीरे-धीरे पीछे हटते हुए भागने लगे। कालयवन उनके पीछे दौड़ता रहा, किन्तु भगवान उसकी पकड़ में न आए। इसी लीला के कारण भगवान श्रीकृष्ण का एक मधुर नाम 'रणछोड़' पड़ा — अर्थात् जिसने प्रजा-हित में रण को छोड़ा। यह नाम कायरता का नहीं, बल्कि दूरदर्शी करुणा का प्रतीक है।
भगवान भागते-भागते एक पर्वत की गुफा में प्रवेश कर गए। उस गुफा में इक्ष्वाकु-वंशी राजा मुचुकुंद बहुत समय से गहरी निद्रा में सोए हुए थे। प्राचीन काल में उन्होंने देवताओं की ओर से असुरों के विरुद्ध बहुत समय तक युद्ध किया था, और थककर जब उन्होंने वरदान माँगा, तो देवताओं ने उन्हें दीर्घ निद्रा का वर दिया — और यह भी कि जो उनकी निद्रा भंग करेगा, वह उनकी दृष्टि से भस्म हो जाएगा।
भगवान ने अपना पीताम्बर मुचुकुंद के ऊपर डाल दिया और स्वयं छिप गए। पीछे-पीछे आया कालयवन अंधकार में मुचुकुंद को ही श्रीकृष्ण समझकर पैर से ठोकर मारकर जगाने लगा। मुचुकुंद की निद्रा भंग हुई, उन्होंने क्रोध भरी दृष्टि से देखा, और उस दृष्टि की अग्नि से कालयवन उसी क्षण भस्म हो गया। इस प्रकार बिना शस्त्र उठाए भगवान ने अधर्मी का अंत करवा दिया।
तत्पश्चात् मुचुकुंद ने भगवान के दिव्य रूप का दर्शन किया और उन्हें साक्षात् नारायण जानकर स्तुति की। भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें तपस्या और मुक्ति का मार्ग बताया। कालयवन वध और 'रणछोड़' नाम की यह कथा सिखाती है कि भगवान की प्रत्येक चाल में भक्तों और प्रजा का कल्याण छिपा रहता है; वे बल से अधिक विवेक और करुणा से कार्य करते हैं।