
नरकासुर वध और सोलह हज़ार कन्याओं की मुक्ति
Narakasur Vadh Aur Solah Hazaar Kanyaaon Ki Mukti
प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर अत्यंत बलशाली किन्तु घोर अधर्मी असुर था। उसने अपने अत्याचारों से देवताओं, ऋषियों और राजाओं को त्रस्त कर रखा था। उसने देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल और वरुण का श्वेत छत्र तक छीन लिया था। इतना ही नहीं, उसने अनेक देश जीतकर सोलह हज़ार से अधिक राजकन्याओं को बंदी बनाकर अपने कारागार में डाल रखा था। उसके अत्याचार से पृथ्वी और स्वर्ग दोनों व्याकुल थे।
देवराज इंद्र स्वयं इस असुर से भयभीत होकर द्वारका आए और भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वे इस अधर्म का अंत करें। भगवान ने प्रजा और देवताओं के कल्याण के लिए यह भार स्वीकार किया। वे अपनी प्रिय पटरानी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर की ओर चल पड़े। सत्यभामा भी वीरता में किसी से कम नहीं थीं और भगवान के साथ इस धर्म-युद्ध में सम्मिलित हुईं।
प्राग्ज्योतिषपुर के चारों ओर पर्वत, शस्त्र और मुर नामक असुर के फैलाए हुए सहस्रों बंधन थे। भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र और अस्त्रों से इन समस्त बाधाओं को नष्ट कर दिया। मुर दैत्य और उसके पुत्रों को परास्त किया। अंत में नरकासुर स्वयं विशाल सेना लेकर सामने आया। घोर संग्राम के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से इस अधर्मी असुर का अंत कर दिया और पृथ्वी को उसके भार से मुक्त किया।
नरकासुर के वध के पश्चात् भगवान ने उसके कारागार में बंदी सोलह हज़ार एक सौ कन्याओं को मुक्त कराया। वे सब कन्याएँ लज्जा और चिंता में डूबी थीं कि अब समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। तब उन्होंने भगवान से ही प्रार्थना की कि वे उनका उद्धार करें और उन्हें अपना लें। भगवान ने करुणावश उन सबको सम्मान और आश्रय दिया, तथा प्रत्येक को द्वारका ले जाकर पटरानी का स्थान प्रदान किया। उन्होंने अपनी योगमाया से एक साथ सबके साथ गृहस्थ-धर्म का पालन किया।
भगवान ने नरकासुर से छीने गए अदिति के कुंडल और अन्य दिव्य वस्तुएँ लौटा दीं। लौटते समय वे स्वर्ग में अदिति के दर्शन के लिए भी गए। मान्यता है कि नरकासुर-वध के इसी दिन से अंधकार पर प्रकाश की विजय के रूप में दीपावली-पर्व की परंपरा जुड़ी हुई है, जब लोग दीप जलाकर अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव मनाते हैं।
नरकासुर वध की यह कथा हमें यह भाव देती है कि भगवान असहायों और पीड़ितों के परम रक्षक हैं। जिन कन्याओं को संसार ने त्याग दिया था, उन्हें भगवान ने अपनी शरण में लेकर सम्मान दिया। इससे स्पष्ट होता है कि प्रभु की करुणा किसी को हीन नहीं समझती; जो भी उन्हें पुकारता है, उसका वे पूर्ण उद्धार करते हैं। यही उनकी अपार दयालुता है।