
शिशुपाल वध — सौ अपराधों की क्षमा
Shishupal Vadh — Sau Aparadhon Ki Kshama
चेदि देश का राजा शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र था। जन्म के समय वह तीन नेत्र और चार भुजाओं वाला था और एक विचित्र स्वर हुआ था कि जिसकी गोद में इसका अतिरिक्त अंग लुप्त हो जाएगा, वही इसका काल होगा। जब भगवान श्रीकृष्ण ने बालक शिशुपाल को गोद में लिया, तो उसका तीसरा नेत्र और अतिरिक्त भुजाएँ लुप्त हो गईं। यह देखकर उसकी माता ने भगवान से प्रार्थना की कि वे उसके सौ अपराध क्षमा कर दें। करुणामय भगवान ने वचन दिया कि वे शिशुपाल के सौ अपराध अवश्य क्षमा करेंगे।
शिशुपाल आरंभ से ही भगवान से द्वेष रखता था। वह जरासंध और कंस का मित्र था और यादवों का विरोधी था। रुक्मिणी के साथ उसका विवाह तय हुआ था, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर उससे विवाह कर लिया, जिससे शिशुपाल का बैर और गहरा हो गया। तब से वह हर अवसर पर भगवान की निंदा और अपमान करता रहा। भगवान अपने वचन के अनुसार उसके एक-एक अपराध को गिनते हुए क्षमा करते रहे।
समय आया जब धर्मराज युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ में विशाल राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में देश-देश के राजा, ऋषि और महात्मा एकत्र हुए। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय सर्वप्रथम पूजा किसकी हो — इस पर विचार हुआ। भीष्म पितामह के परामर्श पर सर्वसम्मति से भगवान श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ मानकर 'अग्रपूजा' का सम्मान दिया गया। समस्त सभा ने इसका हर्ष से समर्थन किया।
यह सम्मान शिशुपाल से सहन न हुआ। वह क्रोध से भर उठा और भरी सभा में खड़े होकर भगवान श्रीकृष्ण की तथा भीष्म पितामह की कटु शब्दों में निंदा करने लगा। वह अपशब्द पर अपशब्द कहता चला गया। भगवान शांत भाव से उसके अपराध गिनते रहे। सभा में उपस्थित अनेक वीर क्रोधित हुए, किन्तु भगवान ने सबको संकेत से शांत रखा।
जब शिशुपाल के अपराधों की संख्या पूरे सौ हो गई और उसने और भी अपमान करना जारी रखा, तब भगवान का दिया हुआ वचन पूर्ण हो चुका था। भगवान ने अपना सुदर्शन चक्र स्मरण किया, और उस दिव्य चक्र ने भरी सभा में शिशुपाल का अंत कर दिया। आश्चर्य यह हुआ कि उसके शरीर से एक तेज-ज्योति निकलकर भगवान में समा गई। जन्म-जन्मांतर से द्वेष-भाव से भी भगवान का निरंतर स्मरण करते-करते शिशुपाल को अंततः भगवान में लय होकर सद्गति प्राप्त हुई।
शिशुपाल वध की यह कथा भगवान की अपार धैर्यशीलता और करुणा का प्रमाण है। वे भक्त और द्वेषी — दोनों का उद्धार करते हैं, और अपना वचन कभी नहीं तोड़ते। इससे यह भाव मिलता है कि प्रभु का स्मरण किसी भी भाव से हो, अंततः वह जीव को मुक्ति की ओर ले ही जाता है। परन्तु श्रेष्ठ यही है कि हम प्रेम और श्रद्धा से उनका स्मरण करें, न कि द्वेष से।