
संदीपनी आश्रम में शिक्षा
Sandipani Ashram Mein Shiksha
मथुरा में कंस-वध और धर्म की पुनर्स्थापना के पश्चात, अब समय आया कि श्रीकृष्ण और बलराम विधिवत शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करें। यद्यपि दोनों भाई स्वयं समस्त विद्याओं के आदि-स्रोत और सर्वज्ञ परमेश्वर थे, तथापि उन्होंने सामान्य मनुष्यों के समक्ष गुरु-सेवा और शिक्षा का महत्व दर्शाने के लिए एक आदर्श गुरुकुल-जीवन का पालन किया। सर्वप्रथम उनका उपनयन संस्कार हुआ, जिससे वे द्विजत्व को प्राप्त हुए और वेदाध्ययन के अधिकारी बने।
तत्पश्चात दोनों भाई अवंतिका (उज्जैन) नगरी में निवास करने वाले महान वेदज्ञ, तपस्वी और आदर्श गुरु संदीपनी मुनि के आश्रम में विद्या ग्रहण करने के लिए गए। उन्होंने संदीपनी को अपना गुरु स्वीकार किया और शिष्य-भाव से उनकी सेवा में लग गए। भगवान होते हुए भी उन्होंने गुरु के प्रति ऐसा आदर, विनम्रता और श्रद्धा प्रकट की, जो समस्त संसार के लिए अनुकरणीय आदर्श बन गई।
गुरुकुल में रहते हुए श्रीकृष्ण और बलराम ने अत्यंत नियमबद्ध, संयमित और सेवामय जीवन बिताया। वे प्रतिदिन गुरु की आज्ञा का पालन करते, आश्रम के कार्यों में सहयोग देते, जंगल से लकड़ी लाते और गुरु तथा गुरुपत्नी की तन-मन से सेवा करते। उन्होंने कभी अपने ऐश्वर्य या राजसी वैभव का अभिमान नहीं किया, अपितु एक साधारण शिष्य की भाँति सरलता और नम्रता से गुरु-सेवा में रत रहे।
गुरु संदीपनी की कृपा और अपनी अद्भुत मेधा के बल पर दोनों भाइयों ने अत्यंत अल्प समय में — मात्र चौंसठ दिनों में — चौंसठ कलाओं और समस्त विद्याओं में पूर्ण प्रवीणता प्राप्त कर ली। उन्होंने वेद, वेदांग, धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, तर्क, मीमांसा तथा धनुर्वेद जैसी शस्त्र-विद्याओं में महारत हासिल की। जो विद्या साधारण मनुष्य वर्षों में नहीं सीख पाता, वह भगवान ने केवल एक बार सुनकर ही धारण कर ली, जिससे स्वयं गुरु संदीपनी भी चकित रह गए।
गुरु संदीपनी को यह भली-भाँति समझ में आ गया कि उनके ये दोनों शिष्य कोई साधारण बालक नहीं, अपितु साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं, जो लीला के रूप में शिष्य बनकर आए हैं। दोनों भाइयों की सेवा, विनम्रता और अद्भुत प्रतिभा से गुरु और गुरुपत्नी का हृदय अपार स्नेह और संतोष से भर गया। ऐसे आदर्श शिष्यों को पाकर वे स्वयं को धन्य मानने लगे।
इस लीला की महिमा यह है कि विद्या और ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सेवा-भाव अनिवार्य है। स्वयं सर्वज्ञ परमेश्वर ने गुरुकुल-वास कर यह दिव्य संदेश दिया कि गुरु का स्थान भगवान से भी ऊँचा है, और सच्चा शिष्य वही है जो अहंकार त्यागकर गुरु-चरणों में समर्पित हो जाए। यही श्रीकृष्ण की संदीपनी-लीला का अमर आदर्श है।