
धनुष यज्ञ — कंस का धनुष तोड़ना
Dhanush Yagya — Kans Ka Dhanush Todna
सुदामा माली के घर से आशीर्वाद और प्रेम पाकर श्रीकृष्ण और बलराम सुसज्जित होकर उस स्थान की ओर चल पड़े, जहाँ कंस ने धनुष यज्ञ का आयोजन किया था। वस्तुतः यह यज्ञ तो केवल एक बहाना था — कंस का वास्तविक उद्देश्य तो इसी आयोजन के बहाने कृष्ण-बलराम को मथुरा बुलाकर उनका वध करवाना था। यज्ञशाला में एक अत्यंत विशाल और दिव्य धनुष रखा हुआ था, जो शिवजी के धनुष के समान भारी और तेजस्वी था, और अनेक रक्षक उसकी पहरेदारी कर रहे थे।
नगर में घूमते-घूमते जब दोनों भाई उस यज्ञशाला में पहुँचे, तो उन्होंने वह दिव्य धनुष देखा। उसकी शोभा और तेज को देखकर श्रीकृष्ण के मन में उसे देखने और उठाने की इच्छा जागी। रक्षकों के मना करते हुए भी श्रीकृष्ण निःशंक भाव से आगे बढ़े और सहज ही उस विशाल धनुष को अपने बाएँ हाथ से उठा लिया, मानो वह कोई खेल की वस्तु हो।
सबके देखते-देखते श्रीकृष्ण ने उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और फिर उसे इतने बल से खींचा कि वह विराट धनुष बीचों-बीच से "कड़ाक" की भयंकर ध्वनि के साथ दो टुकड़ों में टूट गया। उस धनुष के टूटने की गड़गड़ाहट सारी मथुरा में गूँज उठी, यहाँ तक कि उसकी प्रतिध्वनि कंस के कानों तक जा पहुँची और उसका हृदय भय से काँप उठा।
धनुष टूटने की आवाज सुनकर कंस द्वारा नियुक्त रक्षक क्रोध से भरकर शस्त्र लेकर दौड़े और कृष्ण-बलराम को घेरकर "पकड़ो, मारो" चिल्लाने लगे। तब श्रीकृष्ण और बलराम ने उसी टूटे हुए धनुष के आधे भागों को अस्त्र की भाँति उठा लिया, और अपनी रक्षा करते हुए उन दुष्ट रक्षकों को, जो अधर्म के पक्षधर थे, परास्त कर दिया। दोनों भाइयों का यह पराक्रम देखकर नगरवासी आश्चर्यचकित रह गए।
यज्ञशाला से बाहर निकलकर दोनों भाई नगर का भ्रमण करते रहे और संध्या समय अपने साथियों सहित नगर के बाहर आकर विश्राम करने लगे। इधर धनुष टूटने और अपने रक्षकों के पराजित होने का समाचार सुनकर कंस का भय और भी बढ़ गया। उसे रात भर नींद नहीं आई और अनेक अपशकुन देखकर वह और अधिक व्याकुल हो उठा। वह समझ गया कि उसका काल अब निकट आ पहुँचा है।
इस लीला का भाव यह है कि भगवान जब अवतार लेते हैं, तो अधर्म के प्रत्येक आधार को स्वाभाविक रूप से चूर-चूर कर देते हैं। शिव-धनुष के समान दुर्भेद्य वह धनुष श्रीकृष्ण के लिए तिनके के समान था — यह उनके अनंत सामर्थ्य और लीला का प्रतीक है। जो प्रभु के शरण में आ जाता है, उसके लिए बड़े-से-बड़े भय भी नष्ट हो जाते हैं।