
चाणूर-मुष्टिक मल्ल युद्ध
Chanur-Mushtik Mall Yuddh
कुवलयापीड हाथी को परास्त कर जब श्रीकृष्ण और बलराम अखाड़े में प्रविष्ट हुए, तो कंस ने अपने प्रसिद्ध और भयंकर मल्लों — चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल को उनसे लड़ने की आज्ञा दी। ये मल्ल पर्वत के समान विशालकाय और अपार बलशाली थे, और अनेक वीरों को अखाड़े में परास्त कर चुके थे। कंस को विश्वास था कि ये मल्ल अवश्य ही कृष्ण-बलराम का अंत कर देंगे।
चाणूर ने आगे बढ़कर श्रीकृष्ण को ललकारा कि हे नंदनंदन, हमने सुना है कि तुम और तुम्हारे भाई मल्ल-युद्ध में अत्यंत निपुण हो, इसीलिए राजा ने तुम्हें बुलाया है; आओ, हमारे साथ अपने बल की परीक्षा दो। श्रीकृष्ण ने विनम्रता से उत्तर दिया कि हम राजा की प्रजा हैं और उनका प्रिय करना चाहते हैं, किंतु युद्ध तो समान बल वालों के बीच होना चाहिए, यह तो अन्याय है। परंतु चाणूर नहीं माना।
इसके पश्चात भयंकर मल्ल-युद्ध आरंभ हुआ — श्रीकृष्ण चाणूर से और बलराम मुष्टिक से भिड़ गए। दोनों ओर से हाथ-पैरों के प्रहार, दाँव-पेंच और पकड़ चलने लगीं। यह देखकर सभा में उपस्थित मथुरा की प्रजा, विशेषकर सज्जन पुरुष और स्त्रियाँ, दुःख से भर उठीं। वे परस्पर कहने लगीं कि कहाँ ये कोमल किशोर बालक और कहाँ ये पर्वत जैसे मल्ल — यह तो सर्वथा अधर्म है, ऐसी सभा में हमें रुकना भी नहीं चाहिए।
किंतु प्रजा की चिंता व्यर्थ थी, क्योंकि श्रीकृष्ण और बलराम कोई साधारण बालक नहीं, अपितु स्वयं परमेश्वर थे। श्रीकृष्ण चाणूर को इधर-उधर घुमाते, पटकते और थका देते रहे। थोड़ी ही देर में श्रीकृष्ण ने चाणूर को दोनों हाथों से पकड़कर आकाश में कई बार घुमाया और फिर पूरे वेग से भूमि पर पटक दिया, जिससे उस दुष्ट मल्ल के प्राण-पखेरू उड़ गए। उधर बलराम ने भी अपने प्रबल मुष्टि-प्रहारों से मुष्टिक को धराशायी कर दिया।
अपने प्रमुख मल्लों को गिरता देख कूट, शल और तोशल क्रोध से टूट पड़े, किंतु बलराम और श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में ही उन सबका अधर्म समाप्त कर दिया। शेष बचे हुए मल्ल भय से इधर-उधर भाग खड़े हुए। दोनों भाइयों की इस अद्भुत विजय को देखकर सारी प्रजा हर्ष से जय-जयकार करने लगी, आकाश से देवताओं ने पुष्प-वर्षा की और नगाड़े बज उठे।
यह देखकर कंस का क्रोध और भय दोनों अपनी सीमा लाँघ गए। उसने आदेश दिया कि इन दोनों ग्वाल-बालकों को अखाड़े से निकाल दो, नंद को बंदी बना लो और वसुदेव-उग्रसेन का वध कर दो। कंस के इन अधर्मपूर्ण वचनों से उसके पापों का घड़ा भर गया।
इस कथा की महिमा यह है कि भगवान अन्याय और छल का उत्तर सदा धर्म और सामर्थ्य से देते हैं। बलशाली मल्ल भी प्रभु के समक्ष तिनके के समान थे। सच्चा बल भुजाओं में नहीं, अपितु धर्म और भगवद्-आश्रय में निहित है — यही इस लीला का अमर संदेश है।