
अक्रूर का बुलावा और गोपियों का विरह
Akrur Ka Bulawa Aur Gopiyon Ka Virah
मथुरा में कंस के हृदय में भय और द्वेष की ज्वाला निरंतर धधकती रहती थी। नारद के संकेत और अपनी बढ़ती आशंका से वह जान चुका था कि गोकुल में पल रहे नंदनंदन श्रीकृष्ण ही उसके काल हैं। बहुत सोच-विचार के पश्चात कंस ने एक कपटपूर्ण योजना बनाई — धनुष यज्ञ के बहाने कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाकर वहीं मार डालने की। इस कार्य के लिए उसने अपने यदुवंशी मंत्री और परम भक्त अक्रूर को चुना, जो स्वयं भगवान के दर्शन के लिए तरसते थे।
अक्रूर जब रथ लेकर वृंदावन की ओर चले, तो उनका हृदय आनंद से भर उठा। मार्ग भर वे यही सोचते रहे कि आज मुझे उन प्रभु के दर्शन होंगे जिनके चरण-कमलों की धूलि पाने को देवता भी लालायित रहते हैं। जैसे-जैसे व्रज निकट आता गया, उन्हें भूमि पर श्रीकृष्ण के चरण-चिह्न दिखाई देने लगे, तो वे रथ से उतरकर उस धूलि में लोटने लगे और हर्ष से रोमांचित हो उठे। संध्या समय वे नंद के भवन पहुँचे, जहाँ कृष्ण और बलराम ने उनका आदर से स्वागत किया।
जब व्रजवासियों को यह ज्ञात हुआ कि अक्रूर कल प्रातः कृष्ण-बलराम को मथुरा ले जाने आए हैं, तो सारे गोकुल में विषाद की लहर दौड़ गई। गोपियाँ, जिनके प्राण ही श्रीकृष्ण थे, यह समाचार सुनते ही अचेत-सी हो गईं। उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी और वे अक्रूर को "क्रूर" कहकर उलाहना देने लगीं कि यह निष्ठुर हमारे जीवन-धन को हमसे छीनकर ले जा रहा है।
रात्रि भर व्रज में कोई सो न सका। गोपियाँ मंडली बनाकर बैठ गईं और श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं का स्मरण करते हुए विलाप करने लगीं। उनका कहना था — जब कान्हा ही नहीं रहेंगे, तो यमुना का तट, कदंब के वृक्ष, वंशीवट, गोवर्धन और यह सारा वृंदावन किस काम का? कोई विधाता को कोसती, कोई अपने भाग्य को, और कोई रथ के पहियों को रोक देने का उपाय सोचती। उनका यह विरह प्रेम की पराकाष्ठा था।
प्रातःकाल जब रथ चला, तो गोपियाँ दौड़कर रथ के आगे खड़ी हो गईं और मार्ग रोकना चाहा। श्रीकृष्ण ने अपने कोमल वचनों से उन्हें सांत्वना दी और शीघ्र लौट आने का आश्वासन दिया। किंतु प्रेम कहाँ आश्वासनों से शांत होता है। रथ जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, गोपियों की दृष्टि उसकी उड़ती धूलि पर टिकी रही, और जब वह धूलि भी दिखनी बंद हो गई, तब वे मूर्तिवत् वहीं खड़ी रह गईं।
अक्रूर जब यमुना में स्नान करने उतरे, तो जल के भीतर उन्हें श्रीकृष्ण और बलराम के साथ-साथ शेषनाग पर विराजमान चतुर्भुज नारायण के दिव्य दर्शन हुए। तब उनका सारा संशय मिट गया और उन्होंने भाव-विभोर होकर भगवान की स्तुति की। यह देख उनका जीवन धन्य हो गया।
गोपियों का यह विरह वास्तव में भक्ति का सर्वोच्च रूप है — जहाँ भक्त प्रभु को क्षण भर के लिए भी भुला नहीं पाता। यही अनन्य प्रेम भगवान को सबसे प्रिय है, और यही विरह मिलन से भी अधिक मधुर बन जाता है।