
कुवलयापीड हाथी का वध
Kuvalayapeed Haathi Ka Vadh
कंस ने जब देखा कि उसकी सारी योजनाएँ विफल हो रही हैं और धनुष यज्ञ का धनुष भी टूट चुका है, तो उसने कृष्ण-बलराम को मार डालने के लिए अंतिम प्रयास के रूप में मल्ल-युद्ध का दिन निश्चित किया। उसने अखाड़े के प्रवेश-द्वार पर कुवलयापीड नामक एक अत्यंत विशाल और मदमत्त हाथी को खड़ा करवा दिया, तथा उसके महावत को आज्ञा दी कि जैसे ही कृष्ण-बलराम द्वार पर आएँ, वैसे ही यह हाथी उन्हें कुचल डाले।
प्रातःकाल मल्ल-युद्ध देखने के लिए मथुरा की समस्त प्रजा, राजागण और स्वयं कंस मंच पर आकर बैठ गए। नियत समय पर श्रीकृष्ण और बलराम भी अखाड़े के द्वार पर पहुँचे। द्वार पर पर्वत के समान विशाल कुवलयापीड को खड़ा देखकर श्रीकृष्ण ने महावत से गंभीर स्वर में कहा कि अरे महावत, मार्ग छोड़ दे और हमें जाने दे, अन्यथा तुझे और तेरे हाथी दोनों को यमलोक भेज दूँगा।
महावत ने श्रीकृष्ण के इन वचनों को अनसुना कर दिया और अंकुश मारकर उस मदमत्त हाथी को कृष्ण की ओर दौड़ा दिया। कुवलयापीड ने सूँड से श्रीकृष्ण को पकड़ना चाहा, किंतु वे फुर्ती से उसकी पकड़ से निकल गए और उसके पैरों के बीच जा छिपे। क्रोधित हाथी उन्हें ढूँढने लगा, तभी श्रीकृष्ण ने उसकी पूँछ पकड़कर उसे अनायास ही खींचना आरंभ किया, मानो गरुड़ किसी सर्प को खींच रहे हों।
हाथी बार-बार श्रीकृष्ण पर झपटता, परंतु प्रभु उसे बहला-फुसलाकर, कभी आगे कभी पीछे भागते हुए थका देते। इसी क्रीड़ा में श्रीकृष्ण भूमि पर गिरने का अभिनय करते, और जब हाथी उन्हें कुचलने के लिए दाँत गड़ाता, तो वे तुरंत उठकर हट जाते। अंततः श्रीकृष्ण ने बलपूर्वक उसके दोनों दाँत उखाड़ लिए और उन्हीं दाँतों से उस मदमत्त हाथी तथा दुष्ट महावत को अधर्म के दंड-स्वरूप शांत कर दिया।
एक दाँत अपने कंधे पर रखकर और दूसरा हाथ में लिए, हाथी के मद-रक्त से सने हुए श्रीकृष्ण जब अखाड़े में प्रविष्ट हुए, तो उनकी वह वीरोचित छवि अद्भुत शोभा दे रही थी। बलराम भी अपने पराक्रम से दीप्त होकर उनके साथ चल रहे थे। दोनों भाइयों को देखकर दर्शकों में भिन्न-भिन्न भाव उमड़े — किसी को वे वीर लगे, किसी को नरश्रेष्ठ, तो भक्तों को साक्षात् परमेश्वर के दर्शन हुए। कंस का हृदय यह दृश्य देखकर और भी भयभीत हो उठा।
इस लीला का भाव यह है कि अहंकार और मद रूपी विशाल शक्ति भी भगवान के समक्ष टिक नहीं पाती। कुवलयापीड मद का प्रतीक है, और भगवान उसके दाँत उखाड़कर यह दर्शाते हैं कि प्रभु की शरण में अभिमान का अंत निश्चित है। जो अपने अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, वही सच्चा वीर और धन्य होता है।