
रजक (धोबी) वध और माली का सत्कार
Rajak (Dhobi) Vadh Aur Mali Ka Satkar
मथुरा की गलियों में विचरते हुए श्रीकृष्ण और बलराम की सुंदर वेशभूषा की इच्छा हुई, क्योंकि वे व्रज के साधारण वस्त्रों में थे और नगर का उत्सव देखना चाहते थे। तभी मार्ग में उन्हें कंस का एक धोबी मिला, जो सुंदर रंग-बिरंगे और बहुमूल्य वस्त्रों को धोकर ले जा रहा था। श्रीकृष्ण ने बड़ी विनम्रता और मधुरता से उससे कुछ श्रेष्ठ वस्त्र माँगे, जिससे वे और बलराम स्वयं को सुसज्जित कर सकें।
किंतु वह धोबी अत्यंत अभिमानी और कंस का सेवक होने के कारण दुर्वचन बोलने लगा। उसने श्रीकृष्ण को झिड़कते हुए कहा कि ये वस्त्र राजा कंस के हैं, और वन में रहने वाले ग्वालों की इन पर दृष्टि डालना ही धृष्टता है। वह उन दोनों भाइयों का अपमान करते हुए बोला कि यदि जीवित रहना चाहते हो तो चुपचाप यहाँ से चले जाओ, अन्यथा राजा के सैनिक तुम्हें दंड देंगे।
उसके इस अनुचित और अहंकारपूर्ण व्यवहार से श्रीकृष्ण ने उसके अधर्म का अंत करने का निश्चय किया। भगवान ने अपने करकमल से एक ही थपेड़े में उस दुष्ट धोबी को उसके कर्मों का फल दे दिया, और उसका जीवन-नाट्य समाप्त हो गया। वह अभिमानी अपने अहंकार के कारण उस दिव्य अवसर को गँवा बैठा। धोबी के सेवक भय से इधर-उधर भाग गए, और वस्त्रों की गठरियाँ वहीं छोड़ गए।
तब श्रीकृष्ण और बलराम ने अपनी रुचि के अनुसार सुंदर एवं शोभनीय वस्त्र धारण किए। दोनों भाई उन दिव्य वस्त्रों में ऐसे सुशोभित हुए मानो सूर्य और चंद्रमा साक्षात् धरती पर उतर आए हों। शेष वस्त्र उन्होंने वहाँ उपस्थित निर्धन और साधारण जनों में बाँट दिए, जिससे नगर के लोग उनकी उदारता से प्रसन्न हो गए।
आगे बढ़ने पर उन्हें एक भक्त बुनकर (वस्त्रकार) मिला, जिसने प्रेमपूर्वक उनके वस्त्रों को सुंदर ढंग से सजाया और सँवारा। उसकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उसे सारूप्य मुक्ति और ऐश्वर्य का वरदान दिया। इसके पश्चात दोनों भाई सुदामा नामक माली के घर पहुँचे। उस माली ने अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से उनका सत्कार किया, उनके चरणों की पूजा की और सुगंधित पुष्पों की सुंदर मालाएँ अर्पित कीं।
सुदामा माली की निष्काम भक्ति से भगवान का हृदय गद्गद हो उठा। श्रीकृष्ण ने उसे वर दिया कि उसके घर में कभी लक्ष्मी का अभाव न होगा, उसका बल और आयु सदा बढ़ती रहेगी, तथा अंत में वह भगवद्धाम को प्राप्त करेगा। माली धन्य हो गया।
इस कथा की महिमा स्पष्ट है — अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है, जबकि प्रेम और सेवा भाव सदा भगवान की कृपा को आकर्षित करते हैं। धोबी का अभिमान उसे ले डूबा, और माली की विनम्र भक्ति ने उसे अमर पद तक पहुँचा दिया। भाव ही भगवान तक पहुँचने का सच्चा मार्ग है।