
कुब्जा का उद्धार — कुरूपता दूर होना
Kubja Ka Uddhar — Kurupata Door Hona
अक्रूर के साथ रथ पर चढ़कर श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा नगरी में प्रवेश कर चुके थे। नगर की शोभा, ऊँचे भवन, रत्नजड़ित तोरण और उमड़ती हुई जनता को देखते हुए दोनों भाई मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। मथुरा की नारियाँ अपने कार्य छोड़कर छतों और झरोखों से इन दिव्य बालकों के दर्शन करने दौड़ पड़ीं, और उनकी छवि को अपने नेत्रों में बसा लिया।
चलते-चलते श्रीकृष्ण की दृष्टि एक स्त्री पर पड़ी जो सुंदर चंदन और सुगंधित अंगराग लेकर कहीं जा रही थी। किंतु उसका शरीर तीन स्थानों से टेढ़ा था — इसी कारण लोग उसे कुब्जा कहते थे। वह कंस के अंतःपुर में राजा के लिए चंदन लगाने का कार्य करती थी। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा कि हे सुंदरी, तुम किसके लिए यह उत्तम अंगराग ले जा रही हो? हमें भी थोड़ा दे दो।
कुब्जा तो पहले ही श्रीकृष्ण के मनोहर रूप पर मुग्ध हो चुकी थी। उसने बड़े प्रेम से वह श्रेष्ठ चंदन कृष्ण और बलराम के अंगों पर लगा दिया। उसकी इस निष्काम सेवा और सरल भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उस पर कृपा करने का निश्चय किया। भगवान अपने भक्त की छोटी-सी सेवा को भी कभी व्यर्थ नहीं जाने देते।
श्रीकृष्ण ने अपने दोनों चरणों से कुब्जा के पैरों को दबाया और अपने हाथ की दो अंगुलियाँ उसकी ठोड़ी के नीचे लगाकर उसे ऊपर की ओर उठाया। ज्यों ही भगवान ने उसे यों उन्नत किया, त्यों ही उसका टेढ़ा शरीर सीधा हो गया। वह पूर्ण सुंदर, सुडौल और लावण्यमयी युवती बन गई। उसकी कुरूपता सदा के लिए दूर हो गई और उसका मुखमंडल दिव्य कांति से खिल उठा।
रूप और सौंदर्य पाकर कुब्जा का प्रेम श्रीकृष्ण के प्रति और भी गहरा हो गया। उसने भगवान के उत्तरीय का छोर पकड़कर विनम्रता से उन्हें अपने घर पधारने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने स्नेहपूर्वक उसे आश्वासन दिया कि कंस-वध का कार्य पूर्ण करने के पश्चात वे अवश्य ही उसकी अभिलाषा पूर्ण करेंगे, और वे आगे बढ़ गए।
इस लीला की महिमा यही है कि जो भी प्राणी सच्चे भाव और प्रेम से भगवान की सेवा करता है, प्रभु उसके बाहरी और भीतरी दोनों दोषों को दूर कर देते हैं। कुब्जा की टेढ़ी देह का सीधा होना यह दर्शाता है कि भगवद्-स्पर्श से जीव के जन्म-जन्मांतर के विकार मिट जाते हैं। भगवान भक्त के रूप को नहीं, उसके भाव को देखते हैं — यही इस कथा का अमृतमय संदेश है।