
समुद्र सेतु निर्माण में हनुमान जी का योगदान
Samudra Setu Nirman Mein Hanuman Ka Yogdan
जब श्रीराम अपनी विशाल वानर सेना के साथ दक्षिण के तट पर पहुँचे, तब उनके सम्मुख अथाह और गर्जना करता हुआ महासागर फैला था। सीता माता लंका में बंदी थीं, और उनके उद्धार के लिए इस विशाल जलराशि को पार करना अनिवार्य था। श्रीराम ने तट पर बैठकर तीन दिन तक समुद्र देव से मार्ग देने की विनती की, किंतु जब समुद्र ने अभिमानवश उत्तर नहीं दिया, तब प्रभु का धैर्य दृढ़ हो उठा। इस संकट की घड़ी में हनुमान जी सदा प्रभु के समीप, हाथ जोड़े, सेवा में तत्पर खड़े रहे।
समुद्र देव के प्रकट होने पर उन्होंने नल और नील के हाथों सेतु बनाने का उपाय बताया, क्योंकि इन दोनों वानरों को यह वरदान प्राप्त था कि उनके स्पर्श से शिलाएँ जल पर तैरने लगेंगी। तब आरंभ हुआ वह अद्भुत कार्य, जिसमें समस्त वानर सेना जुट गई। हनुमान जी ने इस महाकार्य में अपने अपार बल और अटूट श्रद्धा से जो योगदान दिया, वह अविस्मरणीय है। वे पर्वतों के समान विशाल शिलाखंड और वृक्ष उठाकर लाते और नल-नील के समक्ष रखते जाते थे।
हनुमान जी की विशेषता केवल उनका बल नहीं था, अपितु प्रत्येक शिला पर वे प्रेमपूर्वक "श्रीराम" नाम अंकित करते जाते थे। कहा जाता है कि राम-नाम लिखी हुई वे शिलाएँ स्वयं ही जल पर स्थिर हो जातीं। इस प्रकार भक्ति और परिश्रम का यह अनुपम संगम देखकर देवता भी आकाश से पुष्प वर्षा करने लगे। हनुमान जी का हृदय इस विचार से पुलकित था कि उनके परिश्रम का प्रत्येक क्षण प्रभु सीता के मिलन के निकट ले जा रहा है।
जब कोई वानर थककर बैठ जाता, तब हनुमान जी उसका उत्साह बढ़ाते और स्वयं दुगुने वेग से कार्य में जुट जाते। उनकी सेवा-भावना ऐसी थी कि वे किसी भी कार्य को छोटा या बड़ा नहीं मानते थे। सेतु के दोनों ओर वे दौड़-दौड़कर व्यवस्था देखते, सेना को उत्साहित करते और श्रीराम के आदेश की प्रतीक्षा में सजग रहते। उनके नेतृत्व और परिश्रम से वह असंभव प्रतीत होने वाला कार्य सुगम होता गया।
पाँच दिनों के अथक परिश्रम से वह विशाल सेतु बनकर तैयार हो गया, जो सौ योजन लंबे इस महासागर पर पुल के समान फैल गया। जब श्रीराम ने उस सेतु पर पहला चरण रखा, तब हनुमान जी का आनंद अपरिमित था। उन्होंने प्रभु को अपने कंधे पर बैठाकर उस सेतु को पार कराने की सेवा भी की। समस्त सेना जयघोष करती हुई लंका की ओर बढ़ चली।
यह कथा हमें सिखाती है कि जहाँ अटूट भक्ति और निःस्वार्थ परिश्रम एक साथ मिल जाते हैं, वहाँ असंभव भी संभव हो जाता है। हनुमान जी का यह योगदान इस भाव का प्रतीक है कि प्रभु के कार्य में लगाया गया प्रत्येक श्रम स्वयं ही सिद्धि का द्वार खोल देता है।