Lakshman Ki Murchha Aur Sanjivani Booti

लक्ष्मण की मूर्च्छा और संजीवनी बूटी — द्रोणगिरि पर्वत उठाना

Lakshman Ki Murchha Aur Sanjivani Booti

लंका के भीषण संग्राम में जब मेघनाद ने अपनी अमोघ शक्ति का प्रयोग किया, तब वह दिव्यास्त्र लक्ष्मण जी की छाती में जा लगा और वे मूर्च्छित होकर रणभूमि में गिर पड़े। यह दृश्य देखकर समस्त वानर सेना शोक में डूब गई और स्वयं श्रीराम का धैर्य विचलित हो उठा। प्रभु अपने प्रिय अनुज को गोद में लेकर विलाप करने लगे, और उस क्षण उनकी वेदना देखकर पर्वत भी द्रवित हो उठे।

तब लंका के वैद्य सुषेण को बुलाया गया, जिन्होंने बताया कि लक्ष्मण जी के प्राण तभी बच सकते हैं जब सूर्योदय से पूर्व हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाई जाए। यह कार्य अत्यंत दुष्कर था, क्योंकि इतनी दूरी को इतने अल्प समय में पार करना असंभव प्रतीत होता था। परंतु इस संकट में एक ही आशा की किरण थी — पवनपुत्र हनुमान। प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमान जी तत्काल आकाश-मार्ग से उड़ चले।

वायु के समान वेग से उड़ते हुए हनुमान जी हिमालय पहुँचे और द्रोणगिरि पर्वत पर संजीवनी की खोज करने लगे। किंतु उस पर्वत पर अनेक प्रकाशमान दिव्य ओषधियाँ थीं, और हनुमान जी यह पहचानने में असमर्थ रहे कि इनमें संजीवनी कौन-सी है। समय व्यर्थ करना प्रभु के प्रिय अनुज के प्राणों को संकट में डालना था। तब हनुमान जी ने बिना विलंब किए एक अद्भुत निर्णय लिया।

अपने अपार बल का स्मरण करते हुए हनुमान जी ने संपूर्ण द्रोणगिरि पर्वत को ही अपने हाथों पर उठा लिया। यह विशाल पर्वत, जिस पर वृक्ष, झरने और जड़ी-बूटियाँ थीं, हनुमान जी की हथेली पर एक पुष्प के समान सुशोभित हो उठा। "जब संजीवनी को पहचान न सका, तो पूरा पर्वत ही प्रभु के चरणों में ले चलूँगा" — इस दृढ़ संकल्प के साथ वे पुनः आकाश-मार्ग से लंका की ओर उड़ चले।

मार्ग में जब वे अयोध्या के ऊपर से निकल रहे थे, तब भरत जी ने आकाश में उड़ते इस विशाल स्वरूप को कोई राक्षस समझकर बाण चला दिया, जिससे हनुमान जी कुछ क्षण के लिए धरती पर उतरे। किंतु शीघ्र ही परिचय होने पर वे भरत जी के आशीर्वाद के साथ पुनः उड़ चले। सूर्योदय से पूर्व ही हनुमान जी पर्वत सहित लंका पहुँच गए, और वैद्य सुषेण ने संजीवनी से लक्ष्मण जी का उपचार किया।

जैसे ही संजीवनी के प्रभाव से लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर हुई और वे उठ बैठे, समस्त सेना में हर्ष की लहर दौड़ गई। श्रीराम ने हनुमान जी को हृदय से लगा लिया। यह अमर प्रसंग इस भाव का प्रतीक है कि जहाँ भक्त का हृदय प्रभु-प्रेम से भरा हो और संकल्प अटल हो, वहाँ असंभव कार्य भी क्षण भर में सिद्ध हो जाते हैं।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Samudra Setu Nirman Mein Hanuman Ka Yogdan

समुद्र सेतु निर्माण में हनुमान जी का योगदान

Lanka Yuddh Kaal
Ram Ki Sena Mein Hanuman Ka Senapati Karya

राम की सेना में हनुमान जी का सेनापति कार्य

Lanka Yuddh Kaal
Bharat Ka Baan Aur Hanuman Ka Ayodhya Mein Utarna

भरत का बाण और हनुमान जी का अयोध्या में उतरना

Lanka Yuddh Kaal
Kalnemi Vadh — Ravan Ka Chhal

कालनेमि वध — रावण का छल और हनुमान जी की सतर्कता

Lanka Yuddh Kaal
Makardhwaj Ki Katha

मकरध्वज की कथा — पसीने से जन्मे पुत्र से युद्ध

Lanka Yuddh Kaal
Ahiravan-Mahiravan Vadh

अहिरावण-महिरावण वध — पाताल लोक में राम-लक्ष्मण की रक्षा

Lanka Yuddh Kaal