
अहिरावण-महिरावण वध — पाताल लोक में राम-लक्ष्मण की रक्षा
Ahiravan-Mahiravan Vadh
लंका के युद्ध में जब रावण अपनी अनेक चालों में विफल हो गया, तब उसने अपने परम मायावी भाई अहिरावण (जिसे महिरावण भी कहा जाता है) को स्मरण किया, जो पाताल लोक का राजा और तंत्र-मंत्र तथा माया का महान ज्ञाता था। अहिरावण देवी कामाक्षी का परम भक्त था और उसे यह वरदान प्राप्त था कि वह इच्छानुसार रूप बदल सकता है। रावण की सहायता के लिए उसने एक गुप्त और भयंकर योजना बनाई।
रात्रि के समय जब समस्त वानर सेना निद्रा में थी और श्रीराम तथा लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे, तब अहिरावण ने माया से विभीषण का रूप धारण कर लिया। सतर्क हनुमान जी ने प्रभु की रक्षा के लिए अपनी पूँछ से एक विशाल दुर्ग रच दिया था, जिसमें केवल विभीषण के प्रवेश की अनुमति थी। किंतु अहिरावण उसी रूप में भीतर घुस आया और माया से श्रीराम तथा लक्ष्मण दोनों को उठाकर पाताल लोक ले गया, जहाँ वह उन्हें देवी के समक्ष बलि चढ़ाना चाहता था।
प्रातःकाल जब यह भयंकर समाचार मिला कि प्रभु राम और लक्ष्मण अपहृत हो गए हैं, तब समस्त सेना में हाहाकार मच गया। विभीषण ने बताया कि यह अहिरावण का ही कार्य है और उसे केवल हनुमान जी ही पाताल लोक जाकर पराजित कर सकते हैं। प्रभु की रक्षा का भार अपने कंधों पर लेकर हनुमान जी तत्काल पाताल लोक की ओर चल पड़े, उनका हृदय एकमात्र इसी संकल्प से भरा था कि प्रभु की रक्षा किसी भी मूल्य पर करनी है।
पाताल के द्वार पर हनुमान जी का सामना अपने ही पुत्र मकरध्वज से हुआ, जिसे परास्त कर वे भीतर प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने देखा कि अहिरावण ने श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि हेतु बैठा रखा है। विभीषण से ज्ञात हुआ था कि अहिरावण के प्राण उसके शरीर में नहीं, अपितु विभिन्न दिशाओं में रखे पाँच दीपकों में सुरक्षित हैं, और जब तक वे पाँचों दीपक एक साथ न बुझें, अहिरावण का वध संभव नहीं है।
इसी रहस्य को जानकर हनुमान जी ने अपना दिव्य पंचमुखी स्वरूप धारण किया, जिसके पाँच मुखों से उन्होंने एक साथ पाँचों दिशाओं के दीपक बुझा दिए। दीपक बुझते ही अहिरावण की समस्त शक्ति क्षीण हो गई, और हनुमान जी ने उस मायावी राक्षस का अंत कर दिया। इस प्रकार धर्म पर आए संकट का निवारण हुआ और प्रभु राम-लक्ष्मण को बंधन से मुक्ति मिली।
हनुमान जी ने प्रभु राम और लक्ष्मण को अपने कंधों पर बैठाकर सुरक्षित लंका के शिविर में वापस पहुँचाया, तथा मकरध्वज को पातालपुरी का राजा नियुक्त किया। यह अद्भुत प्रसंग इस भाव को प्रकट करता है कि जहाँ भक्त की निष्ठा अटूट हो, वहाँ पाताल की गहनतम माया भी प्रभु की रक्षा में बाधा नहीं बन सकती।