
मकरध्वज की कथा — पसीने से जन्मे पुत्र से युद्ध
Makardhwaj Ki Katha
जब हनुमान जी लंका दहन करके समुद्र में अपनी जलती हुई पूँछ बुझाने उतरे थे, तब उनके शरीर से एक पसीने की बूँद समुद्र में गिरी। उस बूँद को एक विशाल मकर (मत्स्य) ने निगल लिया, और उसी से एक अद्भुत बालक का जन्म हुआ, जो हनुमान जी के ही समान बलशाली, वानर मुख और पराक्रमी था। इस बालक का नाम मकरध्वज पड़ा, क्योंकि उसकी ध्वजा पर मकर का चिह्न अंकित था। यह मकरध्वज हनुमान जी के तेज से उत्पन्न हुआ उनका ही अंश-पुत्र था।
पातालपुरी के राजा अहिरावण ने जब इस अद्भुत और बलशाली बालक को देखा, तो उसे अपने राज्य के मुख्य द्वार का रक्षक नियुक्त कर दिया। मकरध्वज अपने कर्तव्य के प्रति अत्यंत निष्ठावान था और उसने कभी अपने द्वार की रक्षा में प्रमाद नहीं किया। वह नहीं जानता था कि जिन हनुमान जी के तेज से उसका जन्म हुआ है, वही एक दिन इसी द्वार पर आकर उसके सम्मुख खड़े होंगे।
समय आया जब अहिरावण छल से श्रीराम और लक्ष्मण जी को पाताल लोक ले गया, और उन्हें बचाने के लिए हनुमान जी पाताल पहुँचे। पातालपुरी के द्वार पर पहुँचते ही उनका सामना उस बलशाली द्वारपाल मकरध्वज से हुआ, जिसने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। दोनों में घोर युद्ध छिड़ गया। हनुमान जी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यह वीर उन्हीं के समान रूप और पराक्रम वाला है।
युद्ध के मध्य में हनुमान जी ने मकरध्वज से उसका परिचय पूछा। तब मकरध्वज ने गर्वपूर्वक कहा कि वह पवनपुत्र हनुमान के तेज से समुद्र में उत्पन्न हुआ पुत्र है, और उसका कर्तव्य इस द्वार की रक्षा करना है, चाहे सामने कोई भी क्यों न हो। यह सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना परिचय दिया कि वे ही उसके पिता हनुमान हैं।
पिता का परिचय पाकर मकरध्वज का हृदय श्रद्धा से भर उठा और वह धर्मसंकट में पड़ गया। एक ओर पिता के प्रति भक्ति थी, तो दूसरी ओर स्वामी अहिरावण के प्रति कर्तव्य। उसने विनम्रता से हनुमान जी से कहा कि वह पिता को प्रणाम तो करता है, किंतु स्वामिभक्ति के कारण उन्हें बिना युद्ध किए भीतर जाने नहीं दे सकता। हनुमान जी उसकी इस कर्तव्यनिष्ठा से प्रसन्न भी थे और उन्हें प्रभु के कार्य में विलंब भी स्वीकार नहीं था।
अंततः हनुमान जी ने अपने पुत्र को युद्ध में परास्त कर बाँध दिया, ताकि प्रभु की रक्षा का कार्य पूर्ण हो सके, और बाद में उसे मुक्त कर पातालपुरी का राजा भी बनाया। यह प्रसंग इस भाव को दर्शाता है कि कर्तव्य और भक्ति दोनों ही श्रेष्ठ हैं, किंतु प्रभु-सेवा के समक्ष समस्त संबंध और बाधाएँ स्वयं ही सरल हो जाती हैं।