
समुद्र में पूँछ बुझाना और सीता से चूड़ामणि लेना
Samudra Mein Poonch Bujhana Aur Sita Se Chudamani Lena
सारी लंका को अग्नि की लपटों में समेटकर हनुमान जी अंत में समुद्र के तट पर पहुँचे। उन्होंने अपनी जलती हुई पूँछ को समुद्र के शीतल जल में डुबोकर बुझा लिया। जल के स्पर्श से पूँछ की अग्नि शान्त हो गई और हनुमान जी को शीतलता मिली। इस प्रकार जो अग्नि रावण ने अपमान के लिए जलाई थी, वह लंका को भस्म कर, प्रभु के दूत को कोई हानि पहुँचाए बिना शान्त हो गई।
पूँछ की अग्नि बुझाने के बाद हनुमान जी के मन में एक विचार आया कि लंका को जलाने के आवेश में कहीं उन्होंने अविवेक तो नहीं किया, और सबसे बड़ी चिंता यह कि माता सीता सकुशल तो हैं। इस विचार के आते ही वे पुनः अशोक वाटिका की ओर लौट पड़े, ताकि माता के दर्शन कर उनकी कुशलता जान सकें और उनसे विदा लेकर प्रभु के पास लौटें।
अशोक वाटिका पहुँचकर हनुमान जी ने देखा कि माता सीता पूर्णतः सुरक्षित हैं और उन्हें अग्नि से कोई हानि नहीं पहुँची। यह देखकर उनके मन को अपार शान्ति मिली। उन्होंने माता को प्रणाम किया और उनसे विदा माँगते हुए कहा कि अब वे शीघ्र ही प्रभु के पास लौटकर उन्हें उनका समाचार देंगे और प्रभु सेना सहित आकर उनका उद्धार करेंगे।
विदा लेते समय हनुमान जी ने माता सीता से प्रार्थना की कि वे कोई ऐसी निशानी दें, जिसे देखकर प्रभु श्रीराम को पूर्ण विश्वास हो जाए कि हनुमान जी ने सचमुच माता के दर्शन किए हैं। माता सीता ने अपने केशों में सुरक्षित रखी हुई अपनी चूड़ामणि (शिरोमणि) उतारकर हनुमान जी को दी और कहा कि इसे प्रभु को देकर उन्हें उनके शीघ्र आगमन के लिए प्रेरित करना।
माता सीता ने चूड़ामणि के साथ एक विशेष संदेश भी दिया। उन्होंने काकभुशुण्डि (जयंत) वाले उस प्रसंग का स्मरण कराने को कहा, जिसे केवल श्रीराम और सीता ही जानते थे, ताकि प्रभु को उनकी सत्यता में तनिक भी संदेह न रहे। साथ ही उन्होंने प्रभु से यह भी कहलवाया कि वे शीघ्र आकर उनका उद्धार करें, क्योंकि उनका धैर्य अब क्षीण हो रहा है।
हनुमान जी ने वह पवित्र चूड़ामणि और माता का संदेश अत्यन्त श्रद्धा से हृदय में धारण कर लिया। उन्होंने माता को पुनः धैर्य बँधाया और आश्वासन दिया कि प्रभु का आगमन अब दूर नहीं। माता का आशीर्वाद लेकर, चूड़ामणि को सुरक्षित रखकर, हनुमान जी ने प्रभु के पास लौटने की तैयारी की।
भाव — भक्त प्रभु और भक्त के बीच विश्वास का सेतु बनता है; एक छोटी-सी निशानी भी अटूट प्रेम और सत्य का प्रमाण बन जाती है।